जंतर मंतर | Jantar Mantar in Hindi

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परिचय

जंतर मंतर जयपुर का एक ऐतिहासिक स्मारक है, जोकि भारत की पांच खगोलीय वेधशालाओं में सबसे बड़ा है। यह वेधशाला, यूनेस्‍को की विश्‍व धरोहर स्‍थलों की गिनती में सम्मिलित है, जिसके बारे में यूनेस्‍को का कथन है कि यह वेधशाला मुगल काल के खगोलीय कौशल और ब्रह्माण्‍ड संबंधी अवधारणाओं की अभिव्‍यक्ति का सर्वश्रेष्‍ट उदाहरण है। इसका निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह के द्वारा सन. 1724 से सन. 1734 के मध्य में किया गया था, जो जयपुर के संस्थापक और एक खगोलशास्त्री थे। जिन्होंने भारत में 5 जंतर मंतर दिल्ली, जयपुर, मथुरा, वाराणसी और उज्जेन में बनवाये थे। इन सभी में से दिल्ली और जयपुर का जंतर मंतर ही वर्तमान में ठीक अवस्था में हैं, शेष जंतर मंतर जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं।

जंतर मंतर के बारे में जानकारी

जंतर मंतर जयपुर शहर में सिटी पैलेस और हवा महल के पास स्थित है। इसको बनाने के लिए उत्तम गुणवत्ता वाले संगमरमर का प्रयोग किया गया है। यहाँ पर राम यंत्र भी रखा गया है, जो उस समय ऊँचाई मापने का यंत्र (साधन) हुआ करता था। यह यंत्र वेधशाला में अपने तरीके का अद्वितीय उपकरण है। इस वेधशाला में 14 प्रमुख यंत्र हैं, जिन्हें समय मापने, ग्रहण की भविष्यवाणी करने, किसी तारे की गति एवं स्थिति जानने, सौरमण्डल के ग्रहों दिक्पात जानने में सहायक हैं। इन यंत्रों को देखने से पता चलता है कि भारत के लोगों को गणित एवं खगोलिकी के जटिल संकल्पनाओं का गहन ज्ञान था।

प्रमुख यंत्र

जयपुर के जंतर मंतर में स्थित प्रमुख यन्त्र हैं- बृहत सम्राट यन्त्र, लघु सम्राट यन्त्र, जयप्रकाश यन्त्र, राम यंत्र, ध्रुव यंत्र, दक्षिणा यन्त्र, नाड़ी वलय यन्त्र, राशि वलय, दिशायन्त्र, लघुक्रांति यन्त्र, दीर्घक्रांति यन्त्र, राजयंत्र, उन्‍नतांश यन्त्र, और दिगंश यन्त्र। इनके अलावा यहां महत्वपूर्ण ज्योतिषीय गणनाओं और खगोलीय अंकन के लिए क्रांतिवृत यंत्र, यंत्र राज आदि यंत्रों का भी प्रयोग किया जाता रहा था।

उन्नतांश यंत्र

जंतर मंतर के प्रवेश द्वार के ठीक बांये ओर एक गोलाकार चबूतरे के दोनों ओर दो स्तंभों के बीच लटके धातु के विशाल गोले को उन्नतांश यंत्र के नाम से जाना जाता है। यह यंत्र आकाश में पिंड के उन्नतांश और कोणीय ऊंचाई मापने के काम आता था।

दक्षिणोदक भित्ति यंत्र

उन्नतांश यंत्र के पूर्व में उत्तर से दक्षिण दिशाओं के छोर पर फैली एक दीवारनुमा इमारत दक्षिणोदत भित्तियंत्र है। सामने के भाग में दीवार के मध्य से दोनों ओर सीढियां बनी हैं, जो दीवार के ऊपरी भाग तक जाती हैं। जबकि दीवार का पृष्ठ भाग सपाट है। यह यंत्र मध्याह्न समय में सूर्य के उन्नतांश और उनके द्वारा सूर्य क्रांति व दिनमान जानने के काम आता था।

दिशा यंत्र

यह एक सरल यंत्र है। जंतर मंतर परिसर में बीचों-बीच एक बड़े वर्गाकार समतल धरातल पर लाल पत्थर से विशाल वृत बना है और केंद्र से चारों दिशाओं में एक समकोण क्रॉस बना है। यह दिशा यंत्र है, जिससे सामान्य तौर पर दिशाओं का ज्ञान होता है।

सम्राट यंत्र

जंतर मंतर में सबसे विशाल यंत्र सम्राट यंत्र है। अपनी भव्यता और विशालता के कारण ही इसे सम्राट यंत्र कहा गया। यंत्र की भव्यता का अंदाजा इसी से हो जाता है कि धरातल से इसके शीर्ष की ऊंचाई 90 फीट है। सम्राट यंत्र में शीर्ष पर एक छतरी बनी हुई है। यह यंत्र ग्रह नक्षत्रों की क्रांति, विषुवांश और समय ज्ञान के लिए स्थापित किया गया था।

षष्ठांश यंत्र

षष्ठांश यंत्र, सम्राट यंत्र का ही एक भाग है। यह वलयाकार यंत्र सम्राट यंत्र के आधार से पूर्व और पश्चिम दिशाओं में चन्द्रमा के आकार में स्थित है। यह यंत्र भी ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति और अंश का ज्ञान करने के लिए प्रयुक्त होता था।

जयप्रकाश यंत्र ‘क’ और जयप्रकाश यंत्र ‘ख’

जय प्रकाश यंत्रों का आविष्कार स्वयं महाराजा जयसिंह ने किया। कटोरे के आकार के इन यंत्रों की बनावट बेजोड़ है। जंतर मंतर परिसर में ये यंत्र सम्राट यंत्र और दिशा यंत्र के बीच स्थित हैं। इनमें किनारे को क्षितिज मानकर आधे खगोल का खगोलीय परिदर्शन और प्रत्येक पदार्थ के ज्ञान के लिए किया गया था। साथ ही इन यंत्रों से सूर्य की किसी राशि में अवस्थिति का पता भी चलता है। ये दोनो यंत्र परस्पर पूरक हैं। जंतर मंतर परिसर में यह यंत्र सम्राट यंत्र और दिशा यंत्र के मध्य में स्थित है।

नाड़ी वलय यंत्र

यह यंत्र प्रवेश द्वार के दायें भाग में स्थित है। यह दो गोलाकार फलकों में बंटा हुआ है। इनके केंद्र बिंदु से चारों ओर दर्शाई विभिन्न रेखाओं से सूर्य की स्थिति और स्थानीय समय का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।

ध्रुवदर्शक पट्टिका

ध्रुवदर्शक पट्टिका ध्रुव तारे की स्थिति और दिशा ज्ञान करने के लिए प्रयुक्त होने वाला सरल यंत्र है। उत्तर दक्षिण दिशा की ओर दीवारनुमा यह पट्टिका दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमश: उठी हुई है। इसके दक्षिणी सिरे पर नेत्र लगाकर देखने पर उत्तरी सिरे पर घ्रुव तारे की स्थिति स्पष्ट होती है।

लघु सम्राट यंत्र

लघु सम्राट यंत्र घ्रुव दर्शक पट्टिका के पश्चिम में स्थित यंत्र है। इसे धूप घड़ी भी कहा जाता है। इस यंत्र से स्थानीय समय की सटीक गणना होती है। लाल पत्थर से निर्मित यह यंत्र सम्राट यंत्र का ही छोटा रूप है, इसीलिये यह लघु सम्राट यंत्र के रूप में जाना जाता है।

राशि वलय यंत्र

राशि वलय यंत्र 12 राशियों को इंगित करते हैं। प्रत्येक राशि और उनमें ग्रह-नक्षत्रों की अवस्थिति को दर्शाते इन बारह यंत्रों की खास विशेषता इन सबकी बनावट है। देखने में ये सभी यंत्र एक जैसे हैं, लेकिन आकाश में राशियों की स्थिति को इंगित करते इन यंत्रों की बनावट भिन्न-भिन्न है।

चक्र यंत्र

लोहे के दो विशाल चक्रों से बने इन यंत्रों से खगोलीय पिंडों के दिक्पात और तात्कालिक के भौगोलिक निर्देशकों का मापन किया जाता था। यह राशि वलय यंत्रों के उत्तर में स्थित है।

राम यंत्र

राम यंत्र में स्तंभों के वृत्त के बीच केंद्र तक डिग्रियों के फलक दर्शाए गए हैं। इन फलकों से भी महत्वपूर्ण खगोलीय गणनाएं की जाती थीं। राम यन्त्र जंतर मंतर की पश्चिमी दीवार के पास स्थित दो यंत्र हैं। इन यंत्रों के दो लघु रूप भी जंतर मंतर में इन्हीं यंत्रों के पास स्थित हैं।

दिगंश यंत्र

इस यंत्र के द्वारा पिंडों के दिगंश का ज्ञान किया जाता था। दिगंश यंत्र निकास द्वार के पास स्थित है। यह यंत्र वृताकार प्राचीर में छोटे वृत्तों के रूप में निर्मित है।

ध्रुवदर्शक यंत्र

यह यंत्र ध्रुव तारे की स्थिति को पता लगाने में उपयोगी है।