परिचय

जमनालाल बजाज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उद्योगपति और लोकोपकारक थे। वे जातिगत भेदभाव के घोर विरोधी थे, उन्होंने हरिजनों के उत्थान के लिए कई प्रयत्न किए। उनकी याद में सामाजिक क्षेत्रों में सराहनीय योगदान के लिये ‘जमनालाल बजाज पुरस्कार’ की स्थापना की गयी।

Jamnalal Bajaj Biography in Hindi

शुरूआती जीवन

जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवम्बर, 1889 को एक छोटे से गांव ‘काशी का वास’, जयपुर, राजस्थान में हुआ। उनके पिता का नाम ‘कनीराम’ तथा माता का नाम ‘बिरदीबाई’ था। उनके पिता गरीब किसान थे। उनको 5 वर्ष की आयु में वर्धा के एक बड़े सेठ ‘बच्छराज’ ने गोद ले लिया था। विलासिता से भरपूर वातावरण जमनालाल बजाज को दूषित नहीं कर पाया, क्‍योंकि उनका झुकाव बाल अवस्था से अध्यात्म की तरफ रहा। उनकी सगार्इ 10 वर्ष की आयु में ‘जानकी’ नाम की कन्या के साथ हुई। 3 साल बाद उनका विवाह ‘जानकी’ के साथ धूमधाम से वर्धा में हुआ। उन्होंने अपने बच्चों को बड़े स्कूल में नहीं भेजा, बल्कि उन्हें स्वेच्छापूर्वक वर्धा में आरम्भ किये गये विनोबा के सत्याग्रह आश्रम में भेजा।

महत्त्वपूर्ण कार्य

महात्मा गांधी ने 1935 में ‘अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ’ की स्थापना की। 1936 में आयोजित ‘अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन’, नागपुर के बाद जमनालाल बजाज ने वर्धा में देश के पश्चिम और पूर्व के राज्यों में हिंदी प्रचार के लिए, ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना की। इसके बाद वे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, मद्रास के अध्यक्ष चुने गये। उन्होंने अपने इस पद का उपयोग राष्ट्रभाषा आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में किया। जमनालाल बजाज ने देश के पशुधन की रक्षा का काम अपने लिए चुना और गौ माता को उसका प्रतीक माना। उनका सबसे बड़ा काम गो-सेवा था।

‘राय बहादुर’ की उपाधि

सन् 1918 में जमनालाल बजाज को सरकार ने ‘राय बहादुर’ की उपाधि से विभूषित किया। जब 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ, तो उन्होंने अपनी उपाधि लौटा दी।

सत्याग्रह

1931 में जमनालाल बजाज के प्रयासों के परिणामस्वरूप ‘जयपुर राज्य प्रजा मंडल’ की स्थापना हुई। 1936 में यह मंडल सक्रिय रूप से काम करने लगा। जयपुर राज्य ने 30 मार्च, 1938 को अचानक एक आदेश निकाला, जिसमें सरकार की आज्ञा के बिना जयपुर राज्य में किसी भी सार्वजनिक संस्था की स्थापना नहीं की जा सकती थी।

जमनालाल बजाज 30 दिसम्बर, 1938 को जयपुर राज्य में फैले हुए अकाल का लेखा-जोखा करने और राहत कार्य करने के लिए सवाई माधोपुर स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। इतने में पुलिस अधिकारी एफ.एस यंग ने उनको एक आदेश दिया, जिसमें रियासत में उनके प्रवेश और गतिविधियों के कारण शांति भंग होने का खतरा था। इसकी वजह से जमनालाल बजाज के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया। बाद में जयपुर रियासत ने अपनी गलती मान ली।

मृत्यु

जमनालाल बजाज 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल से रिहाई के बाद महात्मा गाँधी की सहमति से ‘आनंदमयी मां’ से मिलने देहरादून गये। वर्धा लौटने के बाद 11 फ़रवरी, 1942 में मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण उनका अचानक निधन हो गया।