परिचय

जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के महान लेखक थे। उन्होंने एक साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरन्वित किया। बाबू जयशंकर प्रसाद हिंदी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। ये एक युग प्रवर्तक लेखक थे। कवि के रूप में वह सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ छायावादी के चौथे स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठत हुए। जयशंकर प्रसाद ने अपनी रचनाओं में नाटक सबसे ज्यादा लिखे है, उन्हें “कामायनी” पर मंगला प्रसाद पारितोषिक पुरस्कार प्राप्त हुआ।

जन्म व बचपन

जयशंकर प्रसाद जी का जन्म 30 जनवरी 1890 ई. में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में एक वैश्य परिवार में हुआ। जयशंकर प्रसाद के पिताजी का नाम देवी प्रसाद साहु था। जयशंकर प्रसाद जब बाल्य अवस्था के थे, तभी इनके पिता का देहांत हो गया। किशोरावस्था से पूर्व इनकी माता और बड़े भाई का भी देहांत हो गया। जयशंकर प्रसाद जब 17 वर्ष की उम्र के थे, तभी से उनके ऊपर बहुत सारी जिम्मेदारियाँ आ गयीं। वे गम्भीर प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, घर में सहारे के रूप में उनकी विधवा भाभी थी और परिवार के सम्बंधी लोगों ने इनकी सम्पत्ति हडपने की योजना रची। इसी वजह से उन्होंने विद्यालय से पढाई छोड़ दी और घर पर ही अंग्रेजी, हिंदी, फारसी, उर्दू, बांगला और संस्कृत का घोर अध्ययन किया। जयशंकर प्रसाद भगवान शिव के भक्त थे और मॉस मदिरा से दूर रहते थे।

साहित्य सेवाएँ

जयशंकर प्रसाद अनेक प्रतिभा के धनी थे। प्रसाद जी महान कवि, नाटककार, अच्छे उपन्यासकर, कुशल कहानीकार व गम्भीर निबन्धकार थे। उन्होंने हिंदी के श्रेष्ठ ग्रंथो की रचना कर हिंदी साहित्य को समृद्ध बना दिया।

काव्य और उपन्यास

कानन कुसुम, महाराणा का महत्व, झरना, लहर, आंसू, कामायनी, प्रेम पथिक, कंकाल, तितली और इरावती (अपूर्ण उपन्यास) उनके उपन्यास हैं।

नाटक- स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नाग यज्ञ, राजश्री, कामना, एक घूँट, करुणालय, विशाख और अजातशत्रु उनके नाटक हैं।

कहानी- आकाश-दीप, ममता, छाया, प्रतिध्वनि, आंधी, इंद्रजाल आदि उनकी कहानियाँ हैं ।

निबन्ध- सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, प्राचीन आर्यावर्त और उसका प्रथम सम्राट, काव्य कला उनके निबन्ध हैं।

मृत्यु

जयशंकर प्रसाद जी का देहांत टी.बी रोग के कारण 15 नवम्बर 1937 को मात्र 47 वर्ष की आयु में काशी (वनारस) में हुआ।