जयप्रकाश नारायण को लोग ‘जे.पी.’ और ‘लोकनायक’ के नाम से भी जानते हैं। जयप्रकाश नारायण एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता और समाज सुधारक थे। वे खास तौर पर सन 1970 में इंदिरा गांधी के विरोधी पक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाने जाते थे। उनके निधन के बाद उन्हें सन 1998 में भारत सरकार ने भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। सन 1965 में उन्हें समाज की सेवा करने की वजह से ‘मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन 1957 में जयप्रकाश नारायण ने राजनीति छोड़ने का फैसला लिया, मगर सन 1960 के दशक के अंत में वे राजनीति में वापस आ गये। जयप्रकाश नारायण ‘इंदिरा गांधी’ की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ थे और बिगडती हालत के बाद भी उन्होंने सन 1977 में विपक्ष को इक्कठा कर इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।

शुरूआती जीवन

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘हर्सुल दयाल श्रीवास्तव’ तथा माता का नाम ‘फूल रानी देवी’ था। वे अपने माता-पिता के चौथे बच्चे थे। जब वे 9 वर्ष के थे, तब वे अपना घर छोड़कर पटना चले गये थे, ताकि वे पटना के कॉलेजिएट स्कूल में प्रवेश ले सकें। उन्हें उस स्कूल में सरस्वती, प्रभा और प्रताप जैसी पत्रिकाओं को पढ़ने का अवसर मिला। इसके साथ साथ उन्हें भारत-भारती, भारतेंदु हरिश्चंद्र और मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं को भी पढ़ने का मौका मिला।

सन 1920 में जब वे 18 साल के थे, तब उनकी शादी ‘प्रभावती देवी’ से करा दी गई। शादी के बाद जयप्रकाश नारायण अपनी पढाई में लगे हुए थे, इसलिए वे अपनी पत्नी को अपने साथ नहीं रख सकते थे, इसलिए शादी के बाद प्रभावती देवी ‘कस्तूरबा गांधी’ के साथ गांधी आश्रम मे रहीं। वे मौलाना अबुल कलाम आजाद के भाषण से प्रभावित हुए और फिर उन्होंने पटना कॉलेज छोड़ दिया और उसकी जगह ‘बिहार विद्यापीठ’ में प्रवेश लिया।

सन 1922 में बिहार विद्यापीठ में पढाई पूरी होने के बाद वे आगे की पढाई के लिए अमेरिका चले गये। अमेरिका पहुंचकर उन्होंने 1923 में बर्कले विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और वहाँ उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कंपनियों, रेस्टोरेन्टों और खेतों आदि जगहों पर काम किया। इसी बीच उन्हें कर्मचारी वर्ग की समस्याओं के बारे में मालूम चला। इसके बाद उन्होंने MA की डिग्री प्राप्त की और  PHD की पढ़ाई  बीच में ही छोड़कर भारत वापस आना पड़ा, क्योंकि उनकी माँ की तबियत सही नहीं थी।

स्वतंत्रता संग्राम

जब सन 1929 में जयप्रकाश नारायण भारत आये, तब स्वतंत्रता संग्राम काफी जोरों पर चल रहा था। धीरे-धीरे वे ‘जवाहर लाल नेहरु’ और ‘महात्मा गाधी’ के संपर्क में आये और उसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम का एक अहम हिस्सा बने। सन 1932 में जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन चल रहा था, तब महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरु के साथ साथ बाकी बड़े कांग्रेसी नेताओ को जेल में डाल दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने देश के अलग-अलग हिस्सों मे आन्दोलन को दिशा दी और उसके बाद उनकी गतिविधियों को देखते हुए अंग्रेजी सरकार ने मद्रास में सितंबर 1932 में गिरफ्तार करके नासिक जेल भेज दिया। जब वे नासिक जेल में थे, तब वे अच्युत पटवर्धन, एम. आर. मासानी, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, और सी. के. नारायण स्वामी जैसे नेताओं से मिले। इन नेताओं ने CSP (Congress Socialist Party) की नींव रखी। सन 1934 में जब कांग्रेस ने चुनाव मे हिस्सा लेने का निर्णय किया, तब CPS ने इसका विरोध किया।

जयप्रकाश नारायण ने महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच बढ़ते मतभेदों को सुलझाने की भी कोशिश की। दूसरे विश्व युद्ध के चलते जयप्रकाश नारायण ने अंग्रेजी सरकार के विरोध में आंदोलन का नेतृत्व किया और कई अभियान चलाये, जिससे अंग्रेजी सरकार को मिलने वाले राजस्व को रोका जा सके। इसी बीच उन्हें पकड़कर 9 महीने के लिए जेल में डाल दिया गया। सन 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के चलते वे जेल से भाग गए थे।

आजादी के बाद

भारत के आजाद होने के बाद कई सरकारों ने घोटाले और षड्यंत्र किये, जिनकी वजह से देश को बहुत हानि हुई। देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई बढती जा रही थी, ऐसे समय में जयप्रकाश नारायण आगे बढ़े और युवाओं के जरिये जनता को इक्कठा किया। उन्होंने बताया के इन समस्याओं को दूर करने के लिए पूरी व्यवस्था बदलनी पड़गी और पूरी व्यवस्था बदलने के लिए सम्पूर्ण क्रान्ति बहुत जरुरी है। उनके अहिंसावादी आंदोलन की सूरत को देखकर कई लोगों ने उन्हें आजाद भारत का गांधी भी कहा। वे आन्दोलन कुछ ही समय में बिहार से शुरू होकर पूरे देश में फैल गया।

जयप्रकाश नारायण कांग्रेस के सहयोगी थे, मगर आजादी के करीब 2 दशक बाद बनी इंदिरा गांधी की सरकार के भ्रष्ट एवं अलोकतांत्रिक तरीकों की वजह से वे इंदिरा गांधी और उनकी सरकार के खिलाफ खड़े रहे। इसी दौरान सन 1975 में अदालत ने इंदिरा गांधी पर चुनावों में भ्रष्टाचार करने का आरोप साबित हो गया और फिर जयप्रकाश नारायण ने विपक्ष को एकत्रित किया और उनके इस्तीफे की मांग की। इसकी वजह से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल को लागू कर दिया और जयप्रकाश नारायण के साथ-साथ कई विपक्षी के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और उसके बाद जनवरी 1977 को आपातकाल को हटाया गया। मार्च 1977 के चुनावों में लोकनायक के “संपूर्ण क्रांति आदोलन” के दौरान भारत में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी।

देहांत

जयप्रकाश नारायण की तबीयत आन्दोलन के समय से ही खराब होने लग गई थी। जेल में बंद रहने की वजह से अचानक 24 अक्टूबर 1976 को उनकी हालत ज्यादा बिगड़ गई और इसी वजह से 12 नवम्बर 1976 को उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। उन्होंने मुंबई के जसलोक अस्पताल अपनी जांच कराई, जिसके बाद पता चला कि उनकी एक किडनी ख़राब हो गई है। 8 अक्टूबर, 1979 को पटना में मधुमेह और ह्रदय रोग की वजह से उनका देहांत हो गया।