ईश्वरचंद्र विद्यासागर

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परिचय

ईश्वरचंद्र विद्यासागर भारत के मशहूर समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री व स्वतन्त्रता सेनानी थे। वे दलितों और गरीबों के हितैशी भी माने जाते थे। उन्होंने विधवा विवाह, महिला शिक्षा पर भी बहुत जोर दिया। ‘मेट्रोपोलिटन विद्यालय’ सहित अनेक महिला विद्यालयों की स्थापना ईश्वर चंद्र विद्यासागर के द्वारा ही की गयी थी। सन. 1848 में “वैताल पंचविंशति” नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का भी प्रकाशन किया। ईश्वर चंद्र विद्यासागर का मानना था कि नैतिक मूल्यों के संरक्षक और शिक्षाविद की अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके ही भारतीय और पाश्चात्य परंपराओ के श्रेष्ठ को प्राप्त किया जा सकता है।

जन्म

26 सितम्बर सन. 1820 को ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म पश्चिमी मेदिनीपुर जिला, पश्चिम बंगाल में एक गरीब परिवार में हुआ था। ईश्वरचंद्र के पिता का नाम ठाकुरदास बन्धोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। ईश्वरचंद्र विद्यासागर का बचपन बहुत ही गरीबी में गुजरा था।

शिक्षा

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल से ही प्राप्त की थी। केवल 6 वर्ष की उम्र में ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर अपने पिता के साथ कलकत्ता आ गये थे। उन्होंने अपने परिवार को आर्थिक सफलता प्रदान करने के उद्देश्य से ही पढ़ना शुरू किया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपनी कानून की पढ़ाई सन. 1839 में सफलतापूर्वक संपन्न् की। सन. 1841 में मात्र 21 वर्ष की आयु में ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने संस्कृत के शिक्षक के तौर पर ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ में पढ़ाना शुरू कर दिया था। 5 वर्ष बाद ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ छोड़ने के बाद ईश्वरचंद्र विद्यासागर ‘संस्कृत कॉलेज’ में सहायक सचिव के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए कुछ वर्ष पहले ही अपनी सिफारिशें प्रशासन को सौंप दी, लेकिन उनकी रिपोर्ट ने ईश्वरचंद्र विद्यासागर और तत्कालीन कॉलेज सचिव रसोमय दत्ता के बीच विवाद पैदा कर दिया। इस कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा।

सन. 1849 में एक बार फिर ईश्वरचंद्र विद्यासागर को साहित्य के प्रोफेसर के रूप में ‘संस्कृत कॉलेज’ से जुड़ना पड़ा। सन. 1851 में वह इसी कॉलेज के प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त किए गए, लेकिन रसोमय दत्ता के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण ईश्वरचंद्र विद्यासागर को ‘संस्कृत कॉलेज’ से त्यागपत्र देना पड़ा, जिसके बाद में ईश्वरचंद्र विद्यासागर वहाँ प्रधान लिपिक के तौर पर दोबारा ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ में शामिल हुए थे। श्रेष्ठ शिक्षा प्रदर्शन के कारण उन्हें विभिन्न संस्थानों के द्वारा कई छात्रवृत्तियाँ प्रदान की गयी थी। ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक उच्च स्तर के शिक्षित व्यक्ति थे। उनकी विद्वता के कारण ईश्वरचंद्र को ‘विद्यासागर’ की उपाधि दी गयी थी।

समाज सुधारक

ईश्वरचंद्र विद्यासागर को समाज सुधारक के रूप में राजा राममोहन रॉय का उत्तराधिकारी माना जाता है। विधवा पुनर्विवाह के लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने आन्दोलन किया। सन. 1856 में आशय का नियम उत्तीर्ण कराया और सन. 1856 से लेकर सन. 1860 के बीच में 25 विधवा महिलाओं का पुनर्विवाहकराया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी एक विधवा महिला से ही करवाया। उन्होंने ‘बहुपत्नी प्रथा’ और ‘बाल विवाह’ के खिलाफ भी संघर्ष छेड़ा, नारी शिक्षा के लिए भी बहुत प्रयास किए और इसी क्रम में 35 बैठून स्कूलों की स्थापना की।

मृत्यु

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने आर्थिक संकटों का सामना करते हुए भी अपनी उच्च पारिवारिक परम्पराओं को बनाए रखा था। मुसीबत आने पर भी वे अपने सत्य के रास्ते से कभी पीछे नहीं हटे। अपने सहनशीलता, सादगी तथा देशभक्ति के लिए प्रसिद्ध और एक शिक्षाशास्त्री के रूप में विशेष योगदान करने वाले ईश्वर चंद्र विद्यासागर का देहांत 29 जुलाई सन. 1891 को कोलकाता में हुआ था। उनके जीवन से जुड़े अनेक प्रेरक प्रसंग आज भी युवा वर्ग को प्रेरणा प्रदान करते हैं।

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