इन्द्राक्षी शक्तिपीठ | Indrakshi Shaktipeeth in Hindi

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लंका या इन्द्राक्षी शक्तिपीठ को हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह शक्तिपीठ श्रीलंका के जाफना से 35 किलोमीटर दूर नल्लूर में स्थित है। लंका या इन्द्राक्षी शक्तिपीठ प्रसिद्ध त्रिकोणेश्वर मंदिर के निकट है। देवराज इंद्र ने यहां पर माता काली की पूजा की थी। रावण और भगवान राम ने भी यहीं देवी शक्ति की पूजा की थी।

हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ देवी सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ उनके शक्तिपीठ बन गये। ये शक्तिपीठ बहुत ही पावन तीर्थ कहलाये, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए हैं। ये शक्तिपीठ धार्मिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन किया गया है।

पौराणिक कथा

लंका या इन्द्राक्षी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इन सभी स्थानों पर देवी सती के अंग गिरे थे। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव के ससुर राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें राजा दक्ष ने भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा था क्योंकि राजा दक्ष भगवान शिव को अपने बराबर का नहीं समझते थे। यह बात माता सती को काफी बुरी लगी। वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयीं। यज्ञ स्‍थल पर भगवान शिव का काफी अपमान किया गया जिसे माता सती सहन नहीं कर पायीं और वह वहीं हवन कुण्ड में कुद गयीं। भगवान शंकर को ये बात पता चली, जिसके बाद वे वहाँ पर पहुँच गए और माता सती के शरीर को हवनकुण्ड से निकालकर तांडव करने लगे, जिसके कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उथल-पुथल मच गई। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागों में बाँट दिया, जो अंग जहाँ पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया।

लंका या इन्द्राक्षी शक्तिपीठ में माता सती का “पायल” (नूपुर) गिरा था। यहाँ माता सती को ‘इन्द्राक्षी’ और भगवान शिव को ‘राक्षसेश्वर’ के रूप में जाना जाता है।