हरित क्रांति क्या हैं (Harit kranti kya hai)?

हरित क्रांति शब्द का इस्तेमाल सन् 1940 और 1960 के बीच के समय में विकासशील देशों में कृषि क्षेत्र के लिए किया गया था। इस समय में कृषि करने के पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक तकनीक के उपकरणों को प्रयोग करने पर जोर दिया गया। और इसके परिणाम स्वरूप कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि होने से चमत्कारी प्रभाव देखे गए थे। इसके बाद क़ृषि के क्षेत्र में निरंतर शोध से पारंपरिक कृषि में और भी आधारभूत परिवर्तन किए गए। हरित क्रांति के जनक अमरीकी कृषि वैज्ञानिक नौरमन बोरलाग को कहा जाता हैं

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इन्होंने कृषि के विकास की तरफ कदम बढ़ाते हुए जापान में कृषि में कई परिवर्तन किए और जापान को पुनर्निर्माण की राह पर ले आए। इसके लिए उन्होंने न केवल फसलों के लिए और नए और विकसित संसाधित बीजों से नवीनतम तकनीक का प्रयोग किया बल्कि उन्होंने इसी के साथ साथ सिंचाई के लिए आधुनिक उपकरणों के प्रयोग की व्यवस्था , कृत्रिम खाद और कीटनाशक एवं बीज से लेकर विभिन्न नवीनतम उपकरणों व मशीनों के प्रयोग बढ़ाया और इन सब प्रयासों के परिणाम को ही हरित क्रांति माना गया था ।‌

Harit kranti kya hai I हरित क्रांति क्या हैं

हरित क्रांति के जनक –

हरित क्रांति का जनक नौरमन बोरलॉग को माना जाता हैं ।और इन्हीं के प्रयासों की वजह से विभिन्न संस्थाएं और शोधकर्ता भी हरित क्रांति में शामिल हुए थे। सन् 1960 में फिलीपींस अंतरराष्ट्रीय धान शोध संस्थान बनाया गया, और इस संस्थान का गठन भी संयुक्त रूप से रोक फिलर एवं फोर्ड फाउंडेशन के साथ ही किया गया था। इस तरह हरित क्रांति के जनक के प्रयासों की वजह से ही फिलीपींस, इन्डोनेशिया, श्रीलंका, अमरीका, पाकिस्तान में फैले हुए गैर-सोवियत देश, उत्तरी अफ्रीका, एशिया आदि में उन्नत किस्म की फसलें आसानी से पैदा की जा सकी हैं ।

हरित क्रांति के दौरान संकट

* खाद्यान्न का संकट काफी समय से चल रहा था। सन् 1960 के मध्य तक पहुंचते ही यह भी एकदम गहरा गया था। यहां तक चीन से युद्ध के बाद भारत के बहुत से हिस्सों में अकाल जैसी समस्या भी आ गई थी। कुछ समय बाद पूरा देश ही अकाल की चपेट में आ गया था और इसी के साथ यहां की स्थिति एकदम विकट होने लगी थी।

* इसके बाद विदेशों से कुछ ऐसे बीज मंगाना शुरू किया गया जिससे इन बीजों से बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता था। इसलिए इन बीजों को उच्च उत्पादकता किस्में के नाम से जाना जाता था। इन बीजों के इस्तेमाल के लिए पहले सन्  1960 से 1963 के लिए 7 जिलों का चयन किया गया था। जो कि 7 राज्यों में फैला हुआ था। और इस प्रयोग का नाम गहन कृषि कार्यक्रम रखा गया था ।

* यह प्रयोग पूरी तरह से कामयाब भी रहा। और इसी के आधार पर सन् 1966 से 1967 के औपचारिक रूप से भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी ।

* इन प्रयोगों के लिए पारंपरिक बीजों की जगह उच्च उत्पादकता किस्में वाले बीजों का प्रयोग किया। इन बीजों में अधिक उर्वरक की आवश्यकता होती थी। इन‌ बीजों के लिए कीटनाशक भी ज्यादा उपयोग होते थे और इसमें सिंचाई हेतु ज्यादा पानी की जरूरत होती थी ।

* इसलिए सिंचाई परियोजनाओं की तरफ सरकार ने विस्तार करना शुरू कर दिया । इसके बाद से ही उर्वरकों  के लिए सरकार ने सब्सिडी देना भी शुरू कर दिया ।

* इन बीजों के इस्तेमाल के बाद से सबसे पहले गेहूं, बाजारा, ज्वार, चावल, मक्का के उत्पादन का इस्तेमाल किया गया ।

* इन सब प्रयासों के बाद भारत में धीरे – धीरे अनाज की भी बढ़ोतरी होना शुरू हो गया था ।‌

हरित क्रांति के परिणाम –

विश्व के कई बड़े हिस्सों में हरित क्रांति के क्रांतिकारी परिणाम दिखने शुरू हो गए थे । विकासशील देशों ने कम स्थान और उच्चतम फसल के उत्पादन को भी सफल बना दिया था । हरित क्रांति के बाद नए और विकसित बीजों का निर्माण होना शुरू हुआ और ये सारे बीज स्वयं कीटों से खुद की रक्षा करने में भी सक्षम हैं । इन बीजों के माध्यम से एक वर्ष में दो अलग – अलग फसलों की खेती भी की जाने लगी। हरित क्रांति के परिणामस्वरूप ही एक वर्ष में दो बार एक फसल‌ की प्रक्रिया को सभंव किया गया ।

भारत में हरित क्रांति के परिणाम –

भारत में हरित क्रांति के परिणाम को तीन भागों में बांटा गया है जो इस प्रकार है – पहला आर्थिक परिणाम, दूसरा सामाजिक परिणाम, तीसरा राजनीतिक परिणाम हैं ।

Also Read: