हरगोविन्द खुराना की जीवनी | Har Gobind Khorana Biography in Hindi

549

परिचय

हरगोविन्द खुराना एक भारतीय वैज्ञानिक थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार भी मिला था। हरगोविंद खुराना एक भारतीय अमेरिकी बायोकेमिस्ट थे। 1968 में जब वे ‘विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय’, अमरीका में अनुसन्धान करते थे, तब उन्हें  ‘मार्शल डब्ल्यू निरेनबर्ग’ और ‘रॉबर्ट डब्ल्यू होली’ के साथ फिजियोलॉजी और मेडिसिन के लिए नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया, हरगोविन्द खुराना ने ही ‘न्यूक्लिक एसिड’ में ‘न्यूक्लियोटाइड’ (Nucleotide) का क्रम खोजा, जिसमें सेल के जेनेटिक कोड होते हैं।

हरगोविन्द खुराना ब्रिटिश भारत में पैदा हुए थे। हरगोविंद खुराना ने उत्तरी अमेरिका में कुल 3 विश्वविद्यालयों में कार्य किया था। उन्होंने 1966 में संयुक्त राज्य अमेरिका की  नागरिकता हासिल की थी और 1987  में उन्हें विज्ञान का ‘राष्ट्रीय पदक’ भी मिला था।

जीवन और कार्य

हरगोविन्द खुराना का जन्म 9 जनवरी 1922 को भारत के रायपुर, जिला मुल्तान, पंजाब में हुआ था। इनके पिता पटवारी  थे और उनके चार पुत्र थे, ये उनमें से सबसे छोटे  थे। स्कूल और कालेज में एक अच्छा छात्र होने की वजह से हरगोविन्द खुराना को स्कॉलरशिप मिलती थी। हरगोविन्द खुराना ने 1943 में पंजाब विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. आनर्स और 1945 में एम.एस.सी. ऑनर्स पूरा किया और भारत सरकार से स्कॉलरशिप पाकर इंग्लैंड गए।

इंग्लैंड के ‘लिवरपूल विश्वविद्यालय’ में  प्रोफेसर ए. रॉबर्टसन् के अधीन अनुसंधान कर  हरगोविन्द खुराना ने डाक्टरैट की उपाधि प्राप्त की थी।

भारत वापस आने के बाद डॉक्टर हरगोविन्द खुराना को अपने लायक काम नहीं मिला रहा था, तो वे परेशान होकर इंग्लैंड वापस चले गए, जहाँ उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में सदस्यता और ‘लार्ड टाड’ के साथ काम करने का मौका मिला। 1952 में उन्हें ‘ब्रिटिश कोलंबिया रिसर्च काउंसिल’ में ‘बायोकेमिस्ट डिपार्टमेंट’ का अध्यक्ष बना दिया गया था। 1960 में हरगोविन्द खुराना  ने संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘विस्कान्सिन विश्वविद्यालय’ के इंस्टिट्यूट ऑव एन्ज़ाइम रिसर्च में प्रोफेसर का पद पाया, तब इन्होंने अमरीकी नागरिकता ली थी।

हरगोविन्द खुराना जीव कोशिकाओं के नाभिकों की रासायनिक संरचना के अध्ययन करते थे और उसी में लगे रहे। इसके बारे में खोज बहुत लम्बे समय से हो रही है, पर डाक्टर हरगोविन्द खुराना की विशेष तरीकों से वह संभव हुआ।

हरगोविन्द खुराना को इतनी बड़ी खोज के लिए 2 अमरीकी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 1968 में नोबल पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद उन्हें 1958 में कनाडा के ‘केमिकल इंस्टिटयूट’ से ‘मर्क’ पुरस्कार मिला था और इसी साल वे न्यूयार्क के राकफेलर इंस्ट्टियूट में वीक्षक (visiting) प्रोफेसर नियुक्त किये गए थे।

1959 में हरगोविन्द खुराना कनाडा के ‘केमिकल इंस्ट्टियूट’ के सदस्य चुने गए और 1967 में होने वाली ‘बायोकेमिकल अंतरराष्ट्रीय परिषद्’ में उन्होंने उद्घाटन भाषण दिया था। 1968 में डॉ. निरेनबर्ग के साथ उनको 25 हजार डालर का ‘लूशिया ग्रौट्ज हॉर्विट्ज पुरस्कार’ भी मिला है। Google ने इस वर्ष 9 जनवरी 2018 में उनकी 96वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए और उनके कार्यों का सम्मान करते हुए उनकी याद में ‘google doodle’ बनाकर उन्हें सम्मानित किया।