परिचय

हकीम अजमल खान एक भारतीय राष्ट्रवादी राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी और चिकित्सक थे। हकीम अजमल खान ने 20वी सदी के शुरूआती दौर में दिल्ली में ‘तिब्बिया कॉलेज’ की स्थापना की थी, जिसकी वजह से भारत में यूनानी चिकित्सा का पुनरुत्थान हुआ। हकीम अजमल खान एक राष्ट्रवादी नेता तो थे ही और साथ ही वे महात्मा गाँधी के एक निकट सहयोगी भी थे। हकीम अजमल खान ने भारत की आजादी के लिए कई आंदोलनों में भाग लिया।

हकीम अजमल खान ने देश के पहले सबसे बड़े आन्दोलन ‘असहयोग आन्दोलन’ में भी भाग लिया, जिसकी शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी और हकीम अजमल खान ने ‘खिलाफत आन्दोलन’ का नेतृत्व भी किया। आगे चलकर हकीम अजमल खान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हिस्सा बने और सन् 1921 में वे अहमदाबाद में आयोजित किए गये कांग्रेस के सत्र के अध्यक्षता भी रह चुके थे।

इस तरह हकीम अजमल खान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बनने वाले 5वे मुस्लिम नेता बने। केवल राष्ट्रीय आन्दोलन में ही नहीं, बल्कि हकीम अजमल खान ने शिक्षा के क्षेत्र में भी कई कार्य किए। हकीम अजमल खान ‘जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय’ के फाउंडर्स में से एक थे। सन् 1920 से सन् 1927 तक हकीम अजमल खान ‘जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय’ के कुलाधिपति भी रहे। हकीम अजमल खान एकलौते ऐसे व्यक्ति थे, जो कांग्रेस के साथ-साथ ‘अखिल भारतीय खिलाफत समिति’ और ‘मुस्लिम लीग’ के भी अध्यक्ष रह चुके थे।

शुरूआती जीवन

हकीम अजमल खान 11 फरवरी 1868 को दिल्ली में जन्मे थे। हकीम अजमल खान का परिवार उन हकीमों से ताल्लुक रखता था, जो पहले मुग़ल सुल्तान बाबर के साथ भारत आए थे। हकीम अजमल खान के परिवार वाले काफी अच्छे यूनानी चिकित्सक थे और भारत आने के बाद से इसी कार्य में लगे हुए थे। उस समय वे ‘दिल्ली के राय’ के नाम से जाने जाते थे। हकीम अजमल खान के दादा (हकीम शरीफ ख़ान) मुग़ल सुल्तान ‘शाह आलम’ के चिकित्सक के रूप में भी काम कर चुके थे।

हकीम अजमल खान ने छोटी उम्र में ही क़ुरान याद कर ली थी और इसके साथ साथ उन्होंने परंपरागत इस्लामी ज्ञान भी प्राप्त कर लिया था। हकीम अजमल खान ने अरबी और फ़ारसी भाषाएँ भी सीखी और फिर उसके बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान यूनानी चिकित्सा सीखने में लगा दिया। हकीम अजमल खान ने दिल्ली के सिद्दिकी दवाखाना के ‘हकीम अब्दुल जमील’ से यूनानी चिकित्सा का ज्ञान प्राप्त किया।

यूनानी चिकित्सा

सन् 1892 में हकीम अजमल खान की यूनानी चिकित्सा की शिक्षा पूरी हो गई और उसके बाद वे रामपुर के नवाब के मुख्य चिकित्सक बने। धीरे-धीरे इनका नाम लोगों में काफी फैलने लगा। उनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि उनके पास कोई खास दिव्य शक्ति है, जो जादुई तरीके से लोगों का इलाज करती है। ऐसा माना जाता है कि उन्हें चिकित्सा का इतना ज्ञान था कि वे बस लोगों का चेहरा देखकर उसकी बीमारी बता सकते थे। अगर उनके पास कोई दिल्ली में इलाज के लिए आता था, तो वे उसका इलाज मुफ्त में करते थे। अगर उन्हें दिल्ली से बाहर जाकर इलाज करना हो, तो वे हर रोज के 1000 रूपये लेते थे, जो उस समय के हिसाब से काफी ज्यादा रकम थी। उनकी फीस से उनकी काबिलियत का भी पता चलता है।

हकीम अजमल खान ने यूनानी चिकित्सा के तरीके को विकसित करने के लिए बहुत कार्य किए। यूनानी चिकित्सा पद्धति को विकसित करने के कार्य के दौरान हकीम अजमल खान ने दिल्ली में सेंट्रल कॉलेज, हिन्दुस्तानी दवाखाना और आयुर्वेद एवम यूनानी तिब्बिया कॉलेज नामक 3 महत्वपूर्ण संस्थानों को स्थापित किया। इन सभी संस्थानों में चिकित्सा पद्धति के क्षेत्र के विकास में बहुत योगदान दिया। हकीम अजमल खान की ही वजह से यूनानी पद्धति विलुप्त होने से अभी तक बची हुई है।

हकीम अजमल खान को लोग ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ के संस्थापकों में से एक के रूप में भी जानते हैं। 22 नवम्बर 1922 से लेकर अपनी मृत्यु के समय तक वे इस संस्था के कुलाधिपति के पद पर कार्य करते रहे। हकीम अजमल खान ने इस संस्था को आगे बढ़ाने के लिए कई कार्य किए। ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ को अलीगढ से दिल्ली स्थानांतरित भी उनके नेतृत्व में ही किया गया। हकीम अजमल खान ने संस्था को आर्थिक समस्याओं से निकालने के लिए चंदा भी इकठ्ठा किया और कई बार जरुरत पड़ने पर खुद का धन भी लगाया, ताकि यह संस्था सही तरीके से चल सके।

मृत्यु

हकीम अजमल खान उन कुछ लोगों में से एक थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन परोपकार और दूसरों की सहायता में लगा दिया। दिल की बीमारी से 29 दिसंबर 1927 को हकीम अजमल खान का देहांत हो गया। अजमल खान ने राजनीति के क्षेत्र में बस 9 साल काम किया, मगर उनके त्याग, देशभक्ति और बलिदान की वजह से उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा।