ज्ञानी जैल सिंह की जीवनी | Gyani Zail Singh Biography in Hindi

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जैल सिंह 1982 से 1987 तक भारत के राष्ट्रपति रहे थे। राष्ट्रपति बनने से पहले वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के एक कार्यकर्ता थे और वे यूनियन कैबिनेट में बहुत से पदों पर भी रह चुके थे। जिस समय ज्ञानी जैल सिंह भारत के राष्ट्रपति थे, उस समय भारत में बहुत सी घटनाएं घटित हुईं, जिन में से कुछ इस प्रकार हैं-

  • 3 जून 1984 से 8 जून 1984 तक ऑपरेशन ब्लू स्टार।
  • 31 अक्टूबर 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या।
  • 1984 में सिक्ख विरोधी दंगा।

1994 में एक कार एक्सीडेंट में बहुत ज्यादा चोट आने की वजह से ज्ञानी जैल सिंह का देहांत हो गया था।

शुरुआती जीवन

ज्ञानी जैल सिंह का जन्म 5 मई 1916 को फरीदकोट ज़िले में हुआ, जो पंजाब में है। उनके माता का नाम इंद कौर और उनके पिता का नाम भाई किशन सिंह था। इनकी पत्नी का नाम प्रधान कौर था और उनके 4 बच्चे (1 बेटा और 3 बेटियाँ) थे।

ज्ञानी जैल सिंह सिक्ख समुदाय से थे। अमृतसर के शहीद सिक्ख मिशनरी कॉलेज में उन्होंने गुरुग्रंथ साहिब की पढाई की थी, इसी वजह से लोग उन्हें ज्ञानी नाम से बुलाते थे।

आजादी में योगदान

अपने देश की स्वतंत्रता के लिए और देश प्रेम के लिए ज्ञानी जैल सिंह ने 15 वर्ष की उम्र से ही काम करना शुरू कर दिया था। ज्ञानी जैल सिंह अकाली दल के सदस्य बने, ताकि देश के लिए काम कर सकें।

1938 में ज्ञानी जैल सिंह ने एक राजनैतिक पार्टी बनाई, जिसका नाम ‘प्रजामंडल’ रखा गया, जिसने कांग्रेस के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कई आंदोलन किए। इसकी वजह से ज्ञानी जैल सिंह को 5 साल की सजा हुई और उन्हें जेल में डाल दिया गया।

इस दौरान उनका नाम ‘जैल सिंह’ पड़ा। ‘प्रजामंडल पार्टी’ बनाने के दौरान उनकी मुलाकात ‘मास्टर तारा सिंह’ से हुई। ‘मास्टर तारा सिंह’ ने उन्हें अपनी शिक्षा दोबारा शुरू करने की सलाह दी, मगर जैल सिंह का मन पढाई में नहीं लगा और वे गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी में नौकरी करने लगे।

भारत की आजादी से पहले ज्ञानी जैल सिंह अंग्रजों को देश से निकालने के लिए कई आंदोलनों का हिस्सा बने। 1946 में फरीदकोट में एक कार्यक्रम के दौरान अंग्रजों ने जैल सिंह को तिरंगा फहराने से रोक दिया था। इस बात के बाद जैल सिंह ने जवाहरलाल नेहरु जी को चिट्ठी लिखी और उन्हें फरीदकोट आने को कहा। फरीदकोट आने के बाद नहरू जी ने देखा कि कैसे वहां पर लोग जैल सिंह की बात मानते हैं। यह देखकर नेहरु जी ने जैल सिंह की योग्यता पहचान ली और अपनी पार्टी में शामिल कर लिया।

राष्ट्रपति पद

1982 में बिना किसी विरोध के ज्ञानी जैल सिंह भारत के राष्ट्रपति बन गए, फिर भी मीडिया में ऐसी खबर फ़ैल गई कि इनका चुनाव इसलिए किया गया था, क्योंकि इंदिरा गांधी अपने वफादार इंसान को राष्ट्रपति बनाना चाहती थी।

चुनाव के बाद ज्ञानी जैल सिंह ने कहा था कि- “यदि मेरे लीडर कहेंगे कि मैंने झाड़ू उठाना चाहिए और झाड़ू लगाने वाला बन जाना चाहिए, तो मुझे ऐसा करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही मुझे राष्ट्रपति बनने के लिए चुना है।“

25 जुलाई 1982 को राष्ट्रपति कार्यालय में उन्होंने शपथ ली थी। राष्ट्रपति बनने वाले ज्ञानी जैल सिंह पहले सिक्ख थे।

मृत्यु

29 नवम्बर 1994 में ज्ञानी जैल सिंह की कार की ट्रक से टक्कर हो गई थी। इसके बाद इनको बहुत चोट आई थी। 25 दिसम्बर 1994 में चंडीगढ़ में इलाज के दौरान ही इनका देहांत हो गया। इनकी मृत्यु के बाद देश में राष्ट्रीय शोक भी घोषित किया था।