गुरु नानक देव की जीवनी | Guru Nanak Dev Biography in Hindi

86

परिचय

गुरु नानक देव सिखों के प्रथम गुरु थे। इस धर्म के लोग इन्हें ‘नानक देव’, ‘बाबा नानक’ और ‘नानक शाह’ आदि नामों से पुकारते हैं। इन्हें लद्दाख व तिब्बत में ‘नानक लामा’ के नाम से जाना जाता है, ये अपने मानव जीवन में दार्शनिक, योगी, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, गृहस्थ, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु आदि प्रकार के गुणों से परिपूर्ण थे। लोगों का मानना है कि गुरु नानक देव एक सूफी संत थे। इतिहासकारों द्वारा उनके सूफी कवि होने का प्रमाण भी समय-समय पर दिए जाते हैं।

गुरु नानक देव का जन्म कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन रावी नदी के किनारे स्थित “तलवंडी” नामक गाँव में एक ‘खत्री’ परिवार में हुआ था। विद्ववानों के अनुसार इनका जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ था। दीपावली के 15 दिन बाद आने वाली कार्तिक मास की पूर्णिमा ही गुरु नानक देव के जन्म की प्रचलित तिथि मानी जाती है। इनके पिता का नाम कल्याणचंद (मेहता कालू) और इनकी माता का नाम तृप्ता देवी था। कुछ समय बाद ‘तलवंडी’ का नाम गुरु नानक देव के नाम पर ‘ननकाना’ पड़ गया।

गुरु नानक देव का दिमाग बचपन से ही तेज था। लडकपन से ही ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। इनका मन पढ़ाई में नही लगा और इन्होंने 8 वर्ष की उम्र में ही स्कूल छोड़ दिया। अध्यापक ने भगवत प्राप्ति के सम्बन्ध में इनके सवालों के आगे हार मन ली और अध्यापक गुरु नानक देव को सम्मान के साथ घर छोड़ने आ गए। उसके बाद गुरु नानक देव अपना पूरा समय अध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे।

गुरु नानक देव का विवाह 16 वर्ष की आयु (बाल अवस्था) में गुरदासपुर जिले के “लाखौकी” नामक स्थान के रहने वाले मूला की पुत्री ‘सुलक्खनी’ के साथ हुआ था। जब पहले पुत्र ने जन्म लिया, तब गुरु नानक देव 32 साल के थे और इनके पहले पुत्र का नाम ‘श्रीचंद’ रखा गया। 4 वर्ष बाद दूसरे पुत्र ‘लखमीदास’ का जन्म हुआ। दोनों पुत्रों के जन्म के बाद सन 1507 में गुरु नानक देव अपने परिवार की देख-रेख अपने ससुर के भरोसे छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चारों साथियों के साथ तीर्थयात्रा करने चले गये।

 उदासियाँ एवं दर्शन

गुरु नानक देव ने सन 1521 तक तीन यात्रा चक्र पूरे किए, जिसमें भारत, अफगानिस्तान, फ्रान्स और अरब के मुख्य स्थानों का भ्रमण किया, इन यात्राओं को पंजाबी में “उदासियाँ” कहा जाता है।

गुरु नानक देव सर्वश्वरवादी थे। वे मूर्ति पूजा करने वालों को गालियाँ भी दिया करते थे और हिन्दुओं के विरोध में सदा तीक्षण रहे। उन्होंने उस समय राजनितिक, धार्मिक और समाजिक स्थितियों पर भी प्रकाश डाला है। ‘गुरु नानक संत साहित्य’ उन संतों की श्रेणी में है, जिन्होंने महिलाओं को बढ़ावा दिया है।

गुरु नानक देव के उपदेश का सार यह होता था कि भगवान एक है, उसकी पूजा-अर्चना हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिये है। गुरु नानक देव मूर्ति पूजा या अनेक देवी-देवताओं की पूजा को अनावश्यक कहते थे। उसी वक्त लोगों ने गुरु नानक देव की शिकायत इब्राहिम लोदी से की, इब्राहिम लोधी ने उन्हें बहुत दिनों तक कैद रखा और उन्हें भोजन तक भी नही दिया। पानीपत के युद्ध में जब इब्राहीम लोधी और बाबर के बीच युद्ध हुआ, उस युद्ध में इब्राहिम लोधी की हार हुई और बाबर को राज्य सौंप दिया गया। तब गुरु नानक देव को कैद से मुक्त कर दिया गया।

मृत्यु

गुरु नानक देव की प्रसिद्धि जीवन के अंतिम दिनों में बढ़ गई और इनके विचारों में भी बदलाव हुआ। गुरु नानक देव अपने परिवार के साथ रहने लगे, गरीबों की मदद और दान-पुण्य करना, लगंर आदि करने लगे। गुरु नानक ने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जहाँ एक बड़ी धर्मशाला बनवाई, वह नगर अब पाकिस्तान में स्थित है। इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण के दिन 22 सितबंर 1539 को गुरु नानक देव का देहांत हुआ।

गुरु नानक देव ने अपनी मृत्यु से पहले ही अपने शिष्य ‘भाई लहना’ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।

अन्य गुरुओं के नाम