गुरु हर राय की जीवनी | Guru Har Rai Biography in Hindi

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परिचय

गुरु हर राय सिखों के 7वें गुरु थे। वे एक महान अध्यात्मिक व राष्ट्रवादी महापुरुष और योद्धा भी थे। गुरु हर राय का जन्म 16 जनवरी 1630 को पंजाब राज्य के रूपनगर जिले के ‘कीरतपुर साहिब’ नामक कस्बे में हुआ था। गुरू हरगोविन्द सिंह ने अपनी मृत्यु होने से पहले ही अपने पोते गुरु हर राय को 14 वर्ष की आयु में 3 मार्च 1644 को सातवां गुरु घोषित किया। गुरू हर राय के पिता का नाम ‘बाबा गुरदित्ता जी’ एवं माता का नाम ‘निहाल कौर’ था। गुरू हर राय का विवाह ‘माता किशन कौर’ के साथ सन 1640 में हुआ, जो अनूपशहर (बुलन्दशहर) उत्तर प्रदेश के ‘श्री दया राम जी’ की पुत्री थी। गुरू हर राय को दो पुत्र प्राप्त हुए पहले पुत्र का नाम ‘श्री राम राय’ और दूसरे का नाम ‘श्री हरकिशन साहिब’ था।

गुरु हर राय ने अपने दादा गुरू हरगोविन्द सिंह के सिख योद्धाओं के दल को पुनर्गठित किया। उन्होंने सिख योद्धाओं में नए प्राण संचारित किये। वे एक आध्यात्मिक पुरुष होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे। मुगल बादशाह औरंगजेब को अपने राष्ट्र केन्द्रित विचारों के कारण परेशानी हो रही थी। औरंगजेब का आरोप था कि गुरू हर राय ने दारा शिकोह (शाहजहां के सबसे बड़े पुत्र) की सहायता की है। दारा शिकोह संस्कृत भाषा के विद्वान थे। और भारतीय जीवन दर्शन उन्हें प्रभावित करने लगा था।

गुरू हर राय एक बार ‘मालवा’ और ‘दोआबा क्षेत्र’ से यात्रा कर लौट रहे थे, तो मोहम्मद यारबेग खान ने उनके काफिले पर अपने एक हजार सशस्त्र सैनिकों के साथ हमला बोल दिया। इस अचानक हुए आक्रमण का गुरू हर राय ने सिख योद्धाओं के साथ मिलकर बहुत ही बहादुरी से जवाब दिया। दुश्मनों को जान व माल का भारी नुकसान हुआ और वे मैदान छोड़कर भाग निकले। गुरू हर राय अकसर सिख योद्धाओं को बहादुरी के पुरस्कारों से नवाजा करते थे।

गुरू हर राय ने ‘कीरतपुर’ नामक कस्बे में एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी दवाईयों का अस्पताल एवं अनुसंधान केन्द्र की स्थापना भी की। एक बार दारा शिकोह बीमार हो गये थे, उन्होंने हर प्रकार के हकीमों से दवा ली, लेकिन  किसी की दवा से कुछ भी आराम नही मिला। अन्त में गुरू हर राय ने दारा शिकोह का ईलाज किया और उसे  मौत के मुंह से बचा लिया गया।

गुरू हर राय ने लाहौर, सियालकोट, पठानकोट, साम्बा, रामगढ एवं जम्मू एवं कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों का प्रवास भी किया। उन्होंने 360 मंजियों की स्थापना की। उन्होंने भ्रष्ट मसन्द पद्धति सुधारने हेतु सुथरेशाह, साहिबा, संगतिये, मिंया साहिब, भगत भगवान, भगत मल एवं जीत मल भगत जैसे पवित्र एवं आध्यात्मिक लोगों को मंजियों का प्रमुख नियुक्त किया।

गुरू हर राय ने अपने गुरूपद काल के दौरान बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया। भ्रष्ट मसंद, धीरमल एवं मिनहास जैसों ने सिख पंथ के प्रसार में बाधाएं उत्पन्न की। शाहजहां की मृत्यु के बाद गैर मुस्लिमों के प्रति शासक औरंगजेब का रूख और कड़ा हो गया।

मुगल शासक औरंगजेब ने सत्ता संघर्ष की स्थितियों में गुरू हर राय द्वारा की गई दारा शिकोह की मदद को राजनैतिक बहाना बनाया। उसने गुरू साहिब पर बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्हें दिल्ली में पेश होने का हुक्म दिया गया। गुरू हर राय के बदले में उनके बड़े पुत्र ‘राम राय’ दिल्ली गये। उन्होंने ‘धीरमल’ एवं ‘मिनहास’ द्वारा सिख धर्म एवं गुरू घर के प्रति फैलायी गयी भ्रांतियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया। ‘राम राय’ ने मुगल दरबार में ‘गुरबाणी’ की त्रुटिपूर्ण व्याख्या की। उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों एवं गुरु मर्यादा की दृष्टि से यह सब निन्दनीय था।

जब गुरू हर राय को इस घटना के बारे में बताया गया तो उन्होंने राम राय को तुरंत सिख पंथ से निष्कासित किया। राष्ट्र के स्वाभिमान व गुरु घर की परम्पराओं के विरुद्ध कार्य करने के कारण राम राय जी को यह कड़ा दण्ड दिया गया। इस घटना ने सिखों में देश के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिए, ऐसे भावों का संचार हुआ। सिख इस घटना के बाद ‘गुरु घर’ की परम्पराओं के प्रति अुनशासित हो गए। इस प्रकार गुरू साहिब ने सिख धर्म के वास्तविक गुणों, जो गुरू ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज हैं, गुरू नानक देव द्वारा बनाये गये किसी भी प्रकार के नियमों में फेरबदल करने वालों के लिए एक कड़ा कानून बना दिया।

गुरु हर राय ने अपने अन्तिम समय को नजदीक देखते हुए अपने छोटे पुत्र गुरू हरकिशन को आठवें गुरु का पद स्थापित किया। गुरु हर राय का देहांत 6 अक्टूबर 1661 को कीरतपुर साहिब नामक कस्बे में हुआ था।

अन्य गुरुओं के नाम