गुरु हर किशन की जीवनी | Guru Har Krishan Biography in Hindi

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परिचय

गुरु हर किशन सिखों के 8वें गुरु थे, उनका जन्म 7 जुलाई 1656 को पंजाब राज्य के रूपनगर जिले के कीरतपुर साहिब नामक कस्बे में हुआ था। गुरु हर किशन के पिता का नाम ‘गुरु हर राय’ एवं माता का नाम ‘किशन कौर’ था। गुरु हर राय के दो पुत्र थे, बड़े पुत्र का नाम ‘राम राय’ तथा छोटे पुत्र का नाम ‘हर किशन’ था।  गुरू हर किशन को 8 साल की छोटी सी आयु में गुरु का पद का प्राप्त हुआ। उन्हें 6 अक्टूबर 1661 को ‘गुरु हर राय’ ने आठवां गुरु घोषित किया। ‘राम राय’ का व्यवहार अच्छा नहीं था, उनको उनकी गुरु विरोधी गतिविधियों और मुग़ल सलतनत के शासकों का पक्षधर होने के कारण सिख धर्म से निकल दिया था। इसी बात से वो अपने छोटे भाई ‘हर किशन’ से नाराज रहते थे।

‘राम राय’ पद नहीं मिलने के कारण नाराज हो गये और औरंगजेब से इस बात की शिकायत की। औरंगजेब ने ‘राम राय’ का पक्ष लेते हुए ‘राजा जय सिंह’ को चिट्ठी भेजकर ‘गुरू हर किशन’ को उनके समक्ष उपस्थित होने  का आदेश दिया। ‘राजा जय सिंह’ ने अपना संदेशवाहक कीरतपुर भेजकर ‘गुरू हर किशन’ को दिल्ली लाने का आदेश दिया। पहले तो गुरू हर किशन ने चलने के लिए मना कर दिया, परन्तु उनके गुरसिखों एवं राजा जय सिंह के बार-बार कहने पर वो दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गये।

इसके बाद पंजाब के सभी सामाजिक समूहों ने आकर ‘गुरू हर किशन’ को विदायी दी। उन्होंने ‘गुरू हर किशन’ को अम्बाला के निकट “पंजोखरा” नामक गांव तक छोड़ा। इस स्थान पर ‘गुरू हर किशन’ ने लोगों को अपने अपने घर वापस लौट जाने का आदेश दिया। ‘गुरू हर किशन’ अपने परिवारजनों व कुछ सिखों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुये, परन्तु इस स्थान को छोड़ने से पहले ‘गुरू हर किशन’ ने उस महान ईश्वर प्रदत्त शक्ति का परिचय दिया।

‘गुरू हर किशन’ ने बहुत ही कम समय में सामान्य जनता के साथ अपने मित्रतापूर्ण व्यवहार से दिल्ली में लोगों से लोकप्रियता हासिल की। इसी दौरान दिल्ली में ‘हैजा’ और ‘छोटी माता’ जैसी बीमारियों का प्रकोप महामारी लेकर आया। मुगल राज जनता के प्रति असंवेदनशील थी। जात-पात एवं ऊंच-नीच को दरकिनार करते हुए ‘गुरू हर किशन’ ने सभी भारतीय जनों की सेवा का अभियान चलाया।

गुरू हर किशन दिन-रात महामारी से ग्रस्त लोगों की सेवा करते-करते स्वयं बीमार हो गये और ‘छोटी माता’ के अचानक प्रकोप ने उन्हें कई दिनों तक बिस्तर में लिटा दिया। जब उनकी हालत ज्यादा ख़राब हो गयी, तो उन्होने अपनी माता को अपने पास बुलाया और कहा कि अब मेरा अन्त समय निकट आ गया है। जब उन्हें अपने उत्तराधिकारी को नाम लेने के लिए कहा, तो उन्हें अपने मुँह से ‘बाबा बकाला’ का नाम लिया। यह शब्द केवल भविष्य गुरू, ‘गुरू तेगबहादुर’ जो पंजाब में ब्यास नदी के किनारे स्थित बकाला गांव में रह रहे थे, के लिए प्रयोग हुआ था।

प्रचलित कहानियां

लाल चन्द हिन्दू साहित्य का प्रखर विद्वान एव आध्यात्मिक पुरुष था, जो इस बात से विचलित था कि एक बालक को ‘गुरु पद’ कैसे दिया जा सकता है। गुरू हर किशन के सामर्थ्य पर शंका करते हुए लालचंद ने गुरू हर किशन को गीता के श्लोकों का अर्थ करने की चुनौती दी। गुरू हर किशन ने चुनौती स्वीकार की। लालचंद अपने साथ एक गूँगे-बहरे निशक्त व अनपढ़ व्यक्ति छज्जु झीवर (पानी लाने का काम करने वाला) को लाया। गुरू हर किशन ने छज्जु झीवर को सरोवर में स्नान करवाकर बैठाया और उसके सिर पर अपनी छड़ी इंगित कर के उसके मुख से संपूर्ण गीता सार सुनाकर लाल चन्द को हतप्रभ कर दिया।

इस स्थान पर आज के समय में एक भव्य गुरुद्वारा सुशोभित है, जिसके बारे में लोकमान्यता है कि यहाँ स्नान करके शारीरिक व मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिलता है। इसके पश्चात लाल चन्द ने सिख धर्म को अपनाया एवं गुरू हर किशन को कुरूक्षेत्र तक छोड़ा। जब गुरू हर किशन दिल्ली पहुंचे, तो राजा जय सिंह एवं दिल्ली में रहने वाले सिखों ने उनका बड़े ही गर्मजोशी से स्वागत किया। गुरू हर किशन साहिब को राजा जय सिंह के महल में ठहराया गया। सभी धर्म के लोगों का महल में गुरू हर किशन के दर्शन के लिए भीड़ लग गई।

एक बार राजा जयसिंह ने एक ही प्रकार के वेश में सजी बहुत सी महिलाओं को बुलाया और गुरु हर किशन के सामने खड़ा कर असली रानी को पहचानने के लिए कहा। गुरू हर किशन एक महिला की गोद में जाकर बैठ गये, जो नौकरानी की वेश-भूषा में थी। यह महिला ही असली रानी थी। इसके अतिरिक्त भी सिख इतिहास में उनकी बौद्धिक क्षमता को लेकर बहुत सी कहानियाँ प्रचलित है।

मृत्यु

गुरू हर किशन अपने अन्त समय में सभी लोगों से कहा कि कोई भी मेरी मृत्यु होने पर रोयेगा नहीं, बल्कि गुरूबाणी में लिखे शब्दों को गायेंगे। गुरु हर किशन धीरे-धीरे से ‘वाहेगुरू’ शबद् का जप करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए, उनका देहांत 30 मार्च 1664 को हो गया। गुरू गोविन्द सिंह ने अपनी श्रद्धाजंलि देते हुए अरदास में दर्ज किया-

“श्री हरकिशन धियाइये, जिस दिट्ठे सब दु:ख जाए।

दिल्ली में जिस आवास में वो रहे, वहां एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब है।”

अन्य गुरुओं के नाम