गोविन्द बल्लभ पन्त की जीवनी | Govind Ballabh Pant Biography in Hindi

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परिचय

गोविन्द बल्लभ पन्त (जी. बी. पन्त) प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, वरिष्ठ भारतीय राजनेता होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश राज्य के प्रथम मुख्यमन्त्री और भारत के चौथे गृहमंत्री थे। सन 1957 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। गृहमंत्री के रूप में उनका मुख्य योगदान जमींदारी प्रथा को समाप्त करना तथा हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना था।

शुरूआती जीवन

गोविन्द बल्लभ पंत का जन्म 10 सितम्बर 1887 में वर्तमान उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा ज़िले के खूंट (धामस) नामक गाँव में ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम श्री ‘मनोरथ पन्त’ तथा माता का नाम ‘गोविन्दी बाई’ था। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण उनके नाना श्री ‘बद्री दत्त जोशी’ ने किया। गोविन्द बल्लभ पंत ने 10 वर्ष की उम्र तक घर पर ही शिक्षा प्राप्त की। 1897 में उनका दाखिल स्थानीय ‘रामजे कॉलेज’ में प्राथमिक पाठशाला में कराया गया।

वैवाहिक जीवन

गोविन्द बल्लभ पंत का विवाह 1899 में 12 वर्ष की आयु में ‘पं. बालादत्त जोशी’ की कन्या ‘गंगा देवी’ से हुआ। 1909 में उनके पहले पुत्र की बीमारी से मृत्यु हो गयी, कुछ समय बाद पत्नी गंगा देवी की भी मृत्यु हो गयी। उस समय उनकी आयु 23 वर्ष थी। परिवार के दबाव पर 1912 में गोविन्द बल्लभ पंत का दूसरा विवाह अल्मोड़ा में हुआ। इस बीच एक पुत्र की प्राप्ति हुई, पर उसकी भी कुछ महीनों बाद मृत्यु हो गयी, बच्चे के बाद पत्नी का भी 1914 में निधन हो गया।

1916 में गोविन्द बल्लभ पंत ‘राजकुमार चौबे’ की बैठक में चले गये। चौबे जी उनके अनन्य मित्र थे, उनके द्वारा दबाव डालने पर पुनःविवाह के लिए राजी होना पडा और काशीपुर के ही श्री ‘तारादत्त पाण्डे जी’ की पुत्री ‘कला देवी’ से विवाह हुआ। उस समय उनकी आयु 30 वर्ष की थी।

गोविन्द बल्लभ पंत ने संस्कृत, गणित, अंग्रेज़ी विषयों में लोअर मिडिल की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में पास की। वे 12वीं की परीक्षा पास करने तक यहीं पर रहे। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। गोविन्द बल्लभ पंत ने 1907 में बी.ए. और 1909 में कानून की डिग्री अच्छे अंकों के साथ प्राप्त की। इसके उपलक्ष्य में उन्हें कॉलेज की तरफ से “लैम्सडेन अवार्ड” प्रदान किया गया।

कार्यक्षेत्र

9 अगस्त 1925 को ‘काकोरी काण्ड’ में उत्तर प्रदेश के कुछ युवकों ने सरकारी खजाना लूट लिया, तो उनके मुकदमे की पैरवी के लिये अन्य वकीलों के साथ गोविन्द बल्लभ पंत ने भी सहयोग किया। उस दौरान वे नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर विधान परिषद के सदस्य भी थे। 1927 में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ व उनके तीन अन्य साथियों को फाँसी से बचाने के लिये उन्होंने ‘मदन मोहन मालवीय’ के साथ वायसराय को पत्र भी लिखा, किन्तु महात्मा गांधी का समर्थन न मिलने से वह मिशन कामयाब नहीं हुआ। उन्होंने 1928 के साइमन कमीशन का बहिष्कार किया, 1930 के ‘नमक सत्याग्रह’ में भाग लिया तथा मई 1930 में देहरादून जेल में भी कैद हुए।

गोविन्द बल्लभ पंत 17 जुलाई 1937 से लेकर 2 नवम्बर 1939 तक ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के पहले मुख्यमन्त्री बने। इसके बाद दूसरी बार 1 अप्रैल 1946 से 15 अगस्त 1947 तक संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के मुख्यमन्त्री बने। जब संयुक्त प्रान्त का नाम बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ रखा गया, तो फिर से तीसरी बार उन्हें इस पद के लिये चुना गया। इस तरह वे आजाद भारत के नवनामित राज्य के भी मुख्यमन्त्री (26 जनवरी 1950- 27 दिसम्बर 1954) रहे।

सरदार वल्लभ भाई पटेल के निधन के बाद उन्हें गृहमंत्री का कार्यभार सौंपा गया। भारत के गृहमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल (1955- 1961) उनकी मृत्यु होने तक रहा। उनकी मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री उनके उत्तराधिकारी बने।

भारत रत्न पुरस्कार

भारत रत्न पुरस्कार उनके ही काल में आरम्भ हुआ। सन् 1957 में गणतन्त्र दिवस पर गोविन्द बल्लभ पंत को भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

निधन

गोविन्द बल्लभ पंत की मृत्यु हृदयाघात से जूझते हुए 7 मार्च 1961 को हो गयी।