गोवर्धन पूजा की विधि, महत्व और कथा जानें

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हिंदू धर्म में दिवाली के अगले दिन ‘गोवर्धन पूजा’ की जाती है। हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है। इस दिन बलि पूजा, अन्नकूट, मार्गपाली आदि उत्सव भी मनाएं जाते हैं। यह दिन उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा में ‘गोधन मतलब’ गाय की पूजा की जाती है। हिंदू मान्यता के अनुसार गाय को ‘देवी लक्ष्मी’ का स्वरूप माना जाता है। जिस तरह देवी लक्ष्मी सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी तरह गौमाता हमें स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं।

विधि

गोवर्धन के दिन लोग अपने घर के आंगन में गाय के गोबर से एक पर्वत बनाकर उसे जल, मौली, रोली, चावल, फूल दही तथा तेल का दीपक जलाकर उसकी पूजा करते हैं। इसके बाद गोबर से बने इस पर्वत की परिक्रम लगाई जाती है। इसके बाद ब्रज के देवता कहे जाने वाले गिरिराज भगवान को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

महत्व

भारत में गोवर्धन पूजा का बहुत ही महत्व है। इस त्यौहार को ‘अन्नकूट’ के नाम से भी जाना जाता है।  दीपावली के अगले दिन कार्तिक प्रतिप्रदा को ‘गोवर्धन पूजा’ की जाती है। इस त्यौहार की अपनी मान्यता और लोक कथा है। ‘गोवर्धन पूजा’ वाले दिन गाय की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार बताया गया है कि ‘गौऊ माता’ भी उसी प्रकार पवित्र मानी जाती है, जिस प्रकार ‘गंगा मईया’ को पवित्र माना गया है। गाय से प्राप्त दूध, घी, मक्खन, गोबर और मूत्र से भी मानव जाति का कल्याण हुआ है। गाय माता को ‘देवी लक्ष्मी’ का रूप भी कहा गया है। जिस प्रकार ‘देवी लक्ष्मी’ सुख समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गाय माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती है। गाय माता को मानव जाति में पूजनीय माना गया है।

ब्रजवासियों को मुसलाधार वर्षा के प्रकोप से बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने अपनी कन्नी (सबसे छोटी) उगली से सात दिन तक ‘गोवर्धन पर्वत’ को उठाकर रखा और सभी ग्वाल-बाल, गोप-गोपिकाएँ उस पर्वत के नीचे सुख-शांति पूर्वक रहे। भगवान कृष्ण ने सात दिन बाद गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा, सभी ब्रिजवासियों ने धूमधाम से ‘गोवर्धन पर्वत’ की पूजा की और यह त्यौहार तभी से ‘अन्नकूट’ के नाम से मनाया जाने लगा।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ‘देवराज इंद्र’ को घमंड हो गया था, उसका घमंड दूर करने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण ने एक लीला रची। एक दिन ‘भगवान कृष्ण’ ने सभी ब्रिजवासियों को पकवान बनाते हुए देखा और देखकर ऐसा लगा कि ये सभी किसी की पूजा की तैयारी में लगे हुए हैं। भगवान कृष्ण ने ‘मईया यशोदा’ से पूछा कि आप सभी किस लिए पकवान बना रहे हैं। ‘मईया यशोदा’ ने बताया कि हम सभी ब्रजवासी ‘देवराज इंद्र’ की पूजा के लिए ‘अन्नकूट’ की तैयारी कर रहे हैं। ‘भगवान कृष्ण’ ने ‘मईया यशोदा’ से कहा कि हम ‘देवराज इंद्र’ की पूजा क्यों करते हैं। ‘मईया यशोदा’ ने कहा कि ‘देवराज इंद्र’ वर्षा करते हैं, जिससे फसल की पैदावार होती है, उससे हमारी गायों को चारा मिलता है। ‘भगवान कृष्ण’ ने कहा कि हमारी गाय तो ‘गोवर्धन पर्वत’ पर चरती हैं। हमे तो ‘गोवर्धन पर्वत’ की पूजा करनी चाहिए। इंद्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते और उनकी पूजा नहीं की जाती, तो वे नाराज भी हो जाते हैं। हमें  ऐसे अहंकारी (घमंडी) की पूजा नहीं करनी चाहिए।

‘भगवान कृष्ण’ के कहने पर सभी ब्रजवासियों ने ‘गोवर्धन पर्वत’ की पूजा नहीं की, ऐसा करने पर ‘देवराज इंद्र’ ने अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। भयंकर वर्षा देखकर सभी ब्रजवासी ‘भगवान कृष्ण’ को बोलने लगे कि ये सब आपकी वजह से हुआ है। तब ‘भगवान कृष्ण’ ने अपनी बांसुरी को कमर में लगाया और अपनी कन्नी उगली पर सम्पूर्ण ‘गोवर्धन पर्वत’ को उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को गाय एवं बछड़े सहित ‘गोवर्धन पर्वत’ की शरण में ले लिया।

‘भगवान कृष्ण’ की यह लीला देखकर ‘देवराज इंद्र’ नाराज हुए तुरंत ही वर्षा को तेज हवा के साथ और बढ़ा दिया। ‘देवराज इंद्र’ का घमंड तोड़ने के लिए भगवान कृष्ण ने ‘सुदर्शन चक्र’ से कहा कि आप गोवर्धन पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को रोके रखो और ‘शेषनाग’ से कहा आप मेड बनाकर पानी को  पर्वत की और आने से रोको।

देवराज इंद्र सात दिनों तक लगातार मूसलाधार बारिश करते रहे, तब उन्हें एहसास हुआ कि उनका सामना करने वाला कोई आम व्यक्ति नहीं हो सकता। देवराज इंद्र ‘ब्रह्मा जी’ के पास पहुंचे और उन्हें अपनी बात सुनाई। ब्रह्मा जी ने देवराज इंद्र से कहा कि आप जिस ‘कृष्ण’ की बात कर रहे हैं, वह ‘भगवान विष्णु’ का रूप है। ‘ब्रह्मा जी’ बात सुनकर देवराज इंद्र बहुत दु:खी हुए। भगवान कृष्णा से बोले प्रभु में आपको पहचान नही पाया, मुझसे भूल हो गई। आप बड़े दयालु हैं, मेरी भूल क्षमा करें। इसके बाद देवराज इंद्र ने भगवान कृष्ण की पूजा की और भोग लगाया।

इस पुरानी कथा के अनुसार तभी से ब्रजवासी ‘गोवर्धन पर्वत’ की पूजा करते हैं। गाय, बैल, भैंस आदि पशुओं को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है और उनके गले में नई रस्सी बांधी जाती है और उन्हें गुड में जौ मिलकर खिलाने का बहुत ही महत्व है।