परिचय

गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मार्गदर्शकों में से एक थे। उन्हें भारत का ‘ग्लेडस्टोन’ भी कहा जाता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नरमपंथी नेता थे। महात्मा गांधी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। राजनीतिक नेता होने के साथ-साथ वे एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने सन 1905 में ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ संस्था की स्थापना की, ताकि युवाओं के सार्वजानिक जीवन को शिक्षित किया जा सके। गोपाल कृष्ण गोखले का देश की आजादी एवं राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान है।

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के गुहागर तालुका के कोटालुक गाँव में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जो वर्तमान महाराष्ट्र (तब बंबई प्रेसीडेंसी का एक हिस्सा) है। इनके पिता का नाम ‘कृष्ण राव’ तथा माता का नाम ‘वालूबाई’ था। इनके पिता एक किसान थे और माता एक साधारण महिला थीं। गोपाल कृष्ण गोखले ने अपने बड़े भाई की आर्थिक मदद से कोल्हापुर के ‘राजाराम हाई स्कूल’ में अपनी शुरूआती पढ़ाई की। बाद में वे मुंबई चले गए और सन 1884 में 18 वर्ष की आयु में मुंबई के ‘एलफिंस्टन कॉलेज’ से स्नातक की डिग्री हासिल की।

गोपाल कृष्ण गोखले को नवोदित भारतीय बौद्धिक समुदाय और पूरे भारत वर्ष में व्यापक रूप से सम्मानित किया गया। उनको अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था, जिसके कारण वो बिना किसी हिचकिचाहट और अत्यंत स्पष्टता के साथ अपने आप को अभिव्यक्त कर पाते थे। इतिहास के ज्ञान और उसकी समझ ने उन्हें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली को समझने और उसके महत्व को जानने में मदद की।

स्नातक की पढाई के बाद गोपाल कृष्ण गोखले अध्यापन की ओर बढ़े और पुणे के ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ में सहायक शिक्षक का कार्य करने लगे। सन 1885 में वे पुणे चले गए और ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ के अपने सहयोगियों के साथ ‘फर्ग्यूसन कॉलेज’ के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए। गोपाल कृष्ण गोखले ने फर्ग्यूसन कॉलेज को अपने जीवन के करीब दो दशक दिए और कॉलेज के प्रधानाचार्य बने।

इस दौरान गोपाल कृष्ण गोखले ‘महादेव गोविन्द रानाडे’ के संपर्क में आये। महादेव गोविन्द रानाडे एक न्यायाधीश, विद्वान और समाज सुधारक थे, जिन्हे गोपाल कृष्ण गोखले ने अपना गुरु बना लिया। गोपाल कृष्ण गोखले ने पूना सार्वजनिक सभा में महादेव गोविन्द रानाडे के साथ काम किया और उसके सचिव बन गए।

गोपाल कृष्ण गोखले ने सन 1886 में 20 साल की उम्र में सामाजिक जीवन में प्रवेश किया। उन्होंने ‘ब्रिटिश शासन के अधीन भारत’ पर एक सार्वजनिक भाषण दिया, जिसकी बहुत सराहना हुई। उन्होंने ने बाल गंगाधर तिलक की साप्ताहिक पत्रिका ‘मराठा’ के लिए नियमित रूप से लेख लिखे। अपने लेख के माध्यम से उन्होंने लोगों के अन्दर छिपी हुई देशभक्ति को जगाने की कोशिश की। जल्द ही गोपाल कृष्ण गोखले ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ के सचिव के रूप में पदोन्नत किये गए।

सन 1894 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूना में अपने सत्र का आयोजन किया, तब गोपाल कृष्ण गोखले को स्वागत समिति का सचिव बनाया गया। इस सत्र के कारण वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक अहम सदस्य बन गए। गोपाल कृष्ण गोखले पुणे नगरपालिका के दो बार अध्यक्ष नियुक्त किये गए। कुछ दिनों के लिए गोपाल कृष्ण गोखले ‘बंबई विधान परिषद’ के एक सदस्य भी रहे, जहाँ उन्होंने सरकार के खिलाफ अपनी बात रखी।

सन 1892 में गोपाल कृष्ण गोखले ने फरग्यूसन कॉलेज छोड़ दिया। वह दिल्ली में ‘इम्पीरियल विधान परिषद’ के सदस्य बने, जहाँ उन्होंने देशवाशियों के हित के लिए अपनी बात रखी। गोपाल कृष्ण गोखले को हमारे देश की आर्थिक समस्याओं की अच्छी समझ थी, जिसे उन्होंने बहस के समय काफी चतुरता से प्रस्तुत किया।

गोपाल कृष्ण गोखले ने 1905 में ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ नामक एक नई समिति की शुरुआत की। इस समिति ने कार्यकर्ताओं को देश की सेवा के लिए प्रशिक्षित किया। उसी वर्ष गोपाल कृष्ण गोखले ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अनुचित व्यव्हार के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करने इंग्लैंड चले गए। 49 दिनों के अंतराल में उन्होंने 47 विभिन्न सभाओं को सम्बोधित कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत में मूलभूत रूप से स्वराज या स्वशासन पाने के लिए नियमित सुधार की वकालत की। उन्होंने सन 1909 के ‘मॉर्ले मिंटो सुधारों’ के प्रस्तुतीकरण में अहम भूमिका निभाई, जो अंत में एक कानून बन गया। हालाँकि इन सुधारों ने भारत में सांप्रदायिक विभाजन का बीज बोया, फिर भी उन्होंने सरकार के भीतर सबसे अधिक अधिकार वाली सीटों पर भारतीय पहुँच का अधिकार दे दिया और जिस वजह से उनकी आवाज सार्वजनिक हितों के मामले में और अधिक सुनी जाने लगी ।

देहांत

गोपाल कृष्ण गोखले का देहांत 19 फरवरी 1915 को महाराष्ट्र के मुंबई शहर में हुआ, वे मधुमेह और दमा के मरीज थे।