स्वर्ण मंदिर | Swarn Mandir | Golden Temple in Hindi

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स्वर्ण मंदिर भारत देश में पंजाब राज्य के अमृतसर शहर में स्थित है। स्वर्ण मंदिर को दरबार साहिब और हरमंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण चौथे गुरु राम दास ने सन. 1588 में प्रारंभ करवाया था। इस मंदिर के चारों और जलाशय का निर्माण किया गया है, जिसको ‘अमृत सरोवर’ के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की ऊँचाई 7.9 मीटर है और इसकी बाहरी दीवारें सोने की परतों से ढकी हुई हैं, इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर में चार दरबाजे बने हुए हैं, जो चारों दिशाओं में खुलते हैं। यह चार दरवाजे सभी धर्मों के प्रतीक हैं, इस मंदिर में किसी भी धर्म या जाति का व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। गुरु अर्जन साहिब ने अपने नए ग्रन्थ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ की स्थापना भी इसी मंदिर में की थी।

इतिहास

स्वर्ण मंदिर के चारों ओर घिरे ‘अमृत सरोवर’ की योजना को गुरु अमरदास साहिब ने बनाया, जिसका निर्माण सन. 1570 में गुरु राम दास द्वारा किया गया और इसके निर्माण कार्य की देखरेख को बाबा बुद्धा ने संभाला। इस सरोवर में बने स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी गुरु राम दास ने सन. 1578 में करवाया था, जिसके निर्माण कार्य की देख-रेख को स्वयं गुरु अर्जन साहिब ने संभाला और बाबा बुद्ध, भाई गुरुदास, भाई सहलो और अन्य कई समर्पित सिख बंधुओं के द्वारा उन्हें सहायता दी गई।
पूर्व समय में भारत पर हमला करने वालों ने स्वर्ण मंदिर को कई बार नस्ट किया, परन्तु भक्ति और आस्था के कारण इस मंदिर का हर बार दौबारा निर्माण कराया गया। स्वर्ण मंदिर को कब नस्ट और दौबारा बनाया गया, इसका वहां लगे शिलालेखों से पता चलता है। इस मंदिर को अफगान के हमलावरों ने 19 वीं सदी में पूरी तरह नस्ट कर दिया था, तब महाराजा रणजीत सिंह ने दोबारा इसका निर्माण करवाया और साथ ही इसकी गुम्बद को सोने की परत से सजाया। इसकी दीवारों पर कलाकृति को भी तराशा गया है और इनपे विभिन्न कथाएं भी लिखी गयीं। इस मंदिर में चार दरवाजों का निर्माण किया गया है, जो गुरु नानक के उदार धार्मिक विचारों का प्रतीक माने जाते हैं। छुआ-छूत और जाति-धर्म के चलते उस समय कई समाझ के लोगों को मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं थी, लेकिन इस मंदिर में निर्मित के यह चार दरवाजे चारों दिशायों में खुलते हुए, सभी जाति व धर्मों के लोगों को यहां आने के लिए आमंत्रित करते हैं। सन.1757 में वीर सरदार बाबा दीपसिंह ने मुसलमानों के अधिकार से इस मन्दिर को छुड़ाया, किन्तु वे उनके साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, जिनकी तलवार को मन्दिर के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। जांबाज सिख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए इस मंदिर के परिसर में पत्थर से बने स्मारक का निर्माण भी कराया गया है।

निर्माण कार्य

स्वर्ण मंदिर का निर्माण चौथे गुरु गुरुराम दास जी ने सन. 1588 में प्रारंभ करवाया। जिसका निर्माण कार्य पूरा होने में 16 वर्षों का समय लगा। इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर सोने की परत महाराजा रणजीत सिंह ने 19 वीं शताव्दी में इस मंदिर का पुन: निर्माण करवाके लगवाई थीं। यह मंदिर पूर्ण रूप से श्वेत संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है।

पर्यटन

स्वर्ण मंदिर अमृतसर में स्थित देश-विदेशों से आए दर्शकों का प्रमुख अकर्षण केंद्र है। इस मंदिर में रोज लाखों की संख्या में दर्शक व श्रद्धालु आते हैं। स्वर्ण मंदिर में दूर से आए यात्रियों के लिए मुफ्त में नहाने, खाना, सुरक्षित लॉकर्स और सोने की भी व्यवस्था बनी हुई हैं। इस मंदिर के चारों ओर बने अमरित सरोवर में बड़ी-बड़ी नारंगी व पीले रंग की मछलियों को सुरक्षित रखा गया है, जो देखने में दर्शकों के लिए काफी आकर्षक होती हैं।