तराइन का पहला युद्ध | Tarain Ka Pehla Yuddh | First Battle of Tarain in Hindi

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तराइन का पहला युद्ध
तिथि सन. 1191
स्थान तराइन, हरयाणा, भारत
परिणाम मोहम्मद गोरी की पराजय और पंजाब पर चौहान शाशन की स्थापना

तराइन का पहला युद्ध सन. 1191 में दिल्ली के राजा “पृथ्वीराज चौहान” और “मोहम्मद गोरी” के बीच तराइन नामक स्थान पर लड़ा गया। यह युद्ध पृथ्वीराज चौहान ने अपने राज्य का विस्तार करने हेतु लड़ा। जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक मोहम्मद गोरी को परास्त करके पंजाब पर अपना राज्य स्थापित भी कर लिया। इस युद्ध में पृथ्वीराज को बहुत अधिक धन की प्राप्ति भी हुई, जिसको पृथ्वीराज ने अपने वीर सैनिकों में बाँट दिया।

युद्ध

पृथ्वीराज अपने साम्राज्य और सुव्यवस्था को बढ़ाने के लिए हमेशा सोचते थे। जब पृथ्वीराज ने अपने साम्राज्य का पंजाब तक विस्तार करना चाहा, तब पंजाब पर मोहम्मद गोरी का राज स्थापित था। मोहम्मद गोरी एक शक्तिशाली शाशक था। सन. 1186 में लाहौर की गद्दी पर कब्जा करने के बाद गोरी ने भारत के हिन्दू क्षेत्रों की ओर कूच किया और सन. 1990 तक मोहम्मद गोरी ने सम्पूर्ण पंजाब पर अपना अधिकार जमा लिया। पृथ्वीराज ये अच्छे से जानते थे, अगर उन्हें पंजाब तक अपने चौहान साम्राज्य का विस्तार करना है, तो उन्हें मोहम्मद गोरी से युद्ध करना ही पड़ेगा। इसलिए पंजाब को अपने साम्राज्य में विलय करने का दृढ़ संकल्प करके अपनी विशाल सेना के साथ पंजाब की ओर कूच कर गए। जब पहली बार पृथ्वीराज और मोहम्मद गोरी के बीच युद्ध रावी नदी के पास लड़ा गया, इस युद्ध में बहुत रक्तपात हुआ परन्तु इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकला। अत: पृथ्वीराज ने गोरी को परास्त करने के लिए दोबारा युद्ध करने का निर्णय किया।

सन. 1191 में पृथ्वीराज और गोरी का दूसरा युद्ध सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर लड़ा गया। इस बार राजपूतों की सेना ने बहुत साहस के साथ मोहम्मद गोरी की सेना को युद्ध भूमि पर खदेड़ दिया। मोहम्मद गोरी भी बुरी तरह घायल हो गया वह मूर्छित होकर अपने ऊँचे तुर्की घोड़े से गिरने वाला था तभी तीव्र गति से उसके एक सैनिक की नजर उसपर पड़ी और उसने फुर्ती के साथ मोहम्मद गोरी के घोड़े की लगाम संभालते हुए अपने राजा गोरी को युद्ध भूमि से बचाकर भाग निकला। अपने राजा को घायल व मूर्छित अवस्था में भागता हुआ देखकर पूरी सेना घबराकर अपने प्राण बचाने के लिए पीछे की और भागने लगी। गोरी की सेना को भागते हुए देखकर राजपूतों ने 80 मिल तक उनका पीछा किया, लेकिन गोरी की सेना में मुड़कर अपने राजा के अपमान का प्रतिशोद लेने की हिम्मत नहीं हुई।

पृथ्वीराज की इस विजय से उनका नाम एक वीर राजा के नाम से पूरे भारतवर्ष में मशहूर हुआ। इस युद्ध में विजय प्राप्त करके पृथ्वीराज को सात करोड़ रुपयों की सम्पदा प्राप्त हुई, जिसको उन्होंने बड़ी विनम्रता से अपने वीर सैनिको में बाँट दिया।