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दोहे

दोहा एक तरीके का छंद होता है जिसके चार चरण होते हैं| प्रथम व तृतीय छंद में १३-१३ और द्वितीय व चतुर्थ छंद में ११-११ मात्राएँ होती हैं|

कबीर के दोहे

kabir ke dohe
बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा

रहीम के दोहे

rahim ke dohe
कहि 'रहीम' संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति। बिपति-कसौटी जे कसे, सोई सांचे मीत॥

सूरदास के दोहे

surdas ke dohe
चरन कमल बंदौ हरि राई। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥

तुलसीदास के दोहे

tulsidas ke dohe
'तुलसी' जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोड़। तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न

बिहारीलाल के दोहे

amer fort
दृग उरझत, टूटत कुटुम, जुरत चतुर-चित्त प्रीति। परिति गांठि दुरजन-हियै, दई नई यह रीति।।