दिलीप कुमार की जीवनी | Dilip Kumar Biography in Hindi

57

परिचय

दिलीप कुमार एक भारतीय अभिनेता हैं, इन्होंने अपने फिल्मी करियर में कई फिल्मों में काम किया है। दिलीप कुमार ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत ‘ज्वार भाटा’ नामक फिल्म से की थी, जो 1944 में ‘बॉम्बे टॉकीज’ द्वारा प्रोड्यूस की गई थी।

दिलीप कुमार का फ़िल्मी करियर तकरीबन 6 दशकों तक चला और इन्होंने कुल 65 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है, जिनमें अंदाज़ (1949), आन (1952), देवदास (1955), आजाद (1955), मुग़ल-ए-आज़म (1960) और गंगा जमुना (1961) जैसी शानदार फिल्में भी शामिल हैं।

इसके बाद 1976 में दिलीप कुमार ने 5 सालों का ब्रेक ले लिया और फिर अपनी वापसी  ‘क्रांति’ फिल्म से की, जो 3 फरवरी 1981 को रिलीज़ हुई थी। इसके बाद दिलीप कुमार ने शक्ति (1982), कर्मा (1986) और सौदागर (1991) जैसे फिल्मों में काम किया, उनकी आखिरी फिल्म का नाम ‘किला’ था, जो  10 अप्रैल 1998 को रिलीज़ हुई थी।

शुरुआती जीवन

दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसम्बर 1922 को पेशावर (पाकिस्तान) में हुआ था। उनका असली नाम ‘युसूफ खान’ था। दिलीप कुमार के 11 भाई बहन थे। दिलीप कुमार के पिता का नाम ‘लाला गुलाम सरवर’ था, जो फलों के व्यापारी थे। दिलीप कुमार के पिता ने पेशावर और देवलाली (महाराष्ट्र) में बगीचा  भी खरीदा था। दिलीप कुमार ने नाशिक के नजदीक देवलाली के ‘प्रेस्टीजीयस बार्नेस स्कूल’ से अपनी शुरुआती शिक्षा ग्रहण की। 1930 में दिलीप कुमार का पूरा परिवार हमेशा के लिए मुंबई मे रहने के लिए चला गया।

1940 के आस-पास दिलीप कुमार ने अपना घर छोड़ दिया था। तब वे एक किशोर थे। घर छोड़ने के बाद दिलीप कुमार ‘ईरानियन कैफ़े’ के मालिक की मदद से एक कैंटीन कांट्रेक्टर ‘ताज मोहम्मद शाह’ से मिले, जो पेशावर के समय से ही उनके पिता के दोस्त रहे थे। अपने परिवार के बारे में बताए बिना ही उन्हें अपनी काबिलियत की वजह से वहां नौकरी मिल गयी थी। आगे चलकर दिलीप कुमार ने ‘आर्मी क्लब’ में अपना छोटा ‘सैंडविच स्टाल’ भी खोला था और जब कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हुआ, तो वे अपने साथ 5000 रूपये लेकर ‘बॉम्बे’ अपने घर आ गए।

1942 में उनकी मुलाकात चर्चगेट पर ‘डॉ.मसानी’ से हुई, उस समय दिलीप कुमार अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत करना चाहते थे। इसलिए वे ‘डॉ.मसानी’ के साथ ‘बॉम्बे टॉकीज’ आ गए। ‘बॉम्बे टॉकीज’ आने के बाद उनकी मुलाकात ‘बॉम्बे टॉकीज’ की मालकिन ‘देविका रानी’ से हुई। वहां उनकी मुलाकात ‘सशधर मुखर्जी’ से हुई और वे दोनों अच्छे दोस्त बन गए। उर्दू भाषा में अच्छी पकड़ होने की वजह से दिलीप कुमार कहानी-लेखन में उनकी सहायता भी करते थे।

बाद में देविका रानी ने उन्हें फिल्म ‘ज्वार भाटा’, जो 1944 में रिलीज हुई थी,  के लिए मुख्य हीरो के रूप में लांच भी किया और इसी के साथ उनका नाम बदल कर दिलीप कुमार करने की सलाह भी देविका रानी ने दी थी। इस फिल्म ने दिलीप कुमार का पूरा जीवन ही बदल कर रख दिया था।

पुरस्कार व सम्मान

1954 में दिलीप कुमार ‘बेस्ट एक्टर’ के लिये ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’ जीतने वाले पहले एक्टर बने थे।‘ गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में किसी भारतीय एक्टर का सबसे ज्यादा पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड भी दिलीप कुमार के नाम है। दिलीप कुमार के नाम कुल 10 ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’ हैं, जिनमें से 8 ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’ उन्होंने बेस्ट एक्टर के तौर पर जीते हैं, इन्हें एक’ लाइफटाइम फिल्मफेयर अचीवमेंट अवॉर्ड’ भी मिला है, और एक खास ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’, जो उन्हें ‘फिल्म फेयर के पहले प्राप्तकर्ता’ होने की वजह से मिला था। दिलीप कुमार को लाइफटाइम फिल्मफेयर अचीवमेंट अवॉर्ड 1993 में दिया गया था।

दिलीप कुमार को 1980 में मुंबई का ‘शेरिफ’ बना दिया था, जो एक सम्मानित उपाधि है। 1991 में भारत सरकार ने दिलीप कुमार का सम्मान करते हुए उन्हें ‘पद्म भूषण’ से नवाजा था। उन्हें 1994 में ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ और 2015 में ‘पद्म विभूषण’ पुरस्कार भी मिले थे। 1997 में आंध्र प्रदेश सरकार ने ‘एन.टी.आर. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ (NTR National Film Award) के साथ दिलीप कुमार को सम्मानित किया था। 1998 में पाकिस्तान सरकार ने दिलीप कुमार को ‘निशन-ए-इम्तियाज़’ से सम्मानित किया, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार है। तब महाराष्ट्र की रूलिंग पार्टी ‘शिवसेना’ ने इस पुरस्कार का विरोध किया और दिलीप कुमार की देशभक्ति पर सवाल उठाया।

हालांकि, 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह से उन्होंने यह पुरस्कार अपने पास रखा। दिलीप कुमार 2009 को ‘CNN-IBN लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ (CNN-IBN  Lifetime Achievement Award) से भी नवाजा गया।