कौआ | Kaua | Crow in Hindi

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कौए का वैज्ञानिक नाम कोर्वस है और इसको अंग्रेजी में क्रो (Crow) कहते हैं। कौए की छ: प्रजातियाँ भारत में मितली हैं, जिनमें विशेष रूप से केवल दो कौओं का ही जिक्र मिलता है, एक जंगली कौआ जो पूर्ण रूप से काले रंग का होता है और दूसरा घरेलु कौआ जिसके गले पर भूरी रंग की पट्टी होती है और बाकी हिस्सा काले रंग का होता है। कौए काँव-काँव की आवाज़ करते हैं, इनको बहुत चालाक, धूर्त और उदंड पक्षी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार कौओं का दिमाग मनुष्यों और बनमानुष की तरह काम करता है क्योंकि कौओं ने ऐसे बहुत से इम्तिहान पार किए हैं, जिसे दुसरे पक्षी पार नहीं कर पाए। कौओं की स्मृति शक्ति बहुत होती है, अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के अनुसार इनको हानि पहुंचाने वाले का ये चेहरा पाँच वर्ष तक याद रख सकते हैं। अपनी स्मृति शक्ति के सहारे कौए अपने द्वारा छुपाए गए खाने तक दोबारा पहुँचकर उसका सेवन कर सकते हैं।

महत्व

कौओं का महत्त्व भारत के हिन्दू धर्मों में श्राद के दिनों अधिक माना जाता है। क्योंकि कौओं के प्रति भारतीय हिन्दू धर्मों में ऐसी मानयता है कि मनुष्य मरने के पश्चात सबसे पहली योनी कौए की पाता है। इसलिए जो मनुष्य श्राद के दिनों अपने पितरों (Ancestor) को खुश करना चाहते हैं, वह इन दिनों कौओं को भोजन कराते हैं। अगर कौआ भोजन नहीं करता है तो इसे पितरों का नाराज होना माना जाता है। नाराज पितरों को मनाने के लिए फिर अलग-अलग तरह के उपाय किए जाते हैं। उसके उपरांत कौए को दोबारा भोजन कराया जाता है और जब कौआ भोजन कर लेता है तब उनके श्राद को सफल माना जाता है।

लुप्तप्राय प्रजाति

मनुष्यों द्वारा किए गए प्रकृति में असंतुलन के कारण गौरैया और बया के साथ-साथ कौए भी संकटग्रस्त प्रजातियों की श्रेणी में आ चुके हैं। एक समय था, जब बहुत सी जगहों पर कौओं का समूह देखने को आराम से मिल जाया करता था, परन्तु आज कौओं का मिलना लगभग ना के बराबर होता जा रहा है। डॉ. अफीफउल्ला जो ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ के जीव विभाग से हैं उनका कहना है कि बढ़ते प्रदूषण और घटती बायोडायवर्सिटी के कारण कौओं की संख्या में बहुत तेजी से कमी हुई है। इसी कारण वर्तमान में श्राद के दिनों मनुष्यों को भोजन कराने के लिए कौए नहीं मिलते और वह अपने श्राद के अनुष्ठान को पूर्णत: नहीं कर पाते।

कौए मुख्य रूप से गंदगी खाते हैं और मनुष्य अब कूड़ा भी पॉलिथीन के साथ फेकते हैं। खेतों में भी जहरीले किटनाशक पदार्थों का प्रयोग हो रहा है। जानवरों के शरीर पर भी ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन का प्रोयग किया जा रहा है, जिसके कारण जानवरों के मरने के पश्चात उनके मांस को खाकर कौए मरते जा रहे हैं।