चित्तरंजन दास की जीवनी | Chittaranjan Das Biography in Hindi    

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परिचय

चित्तरंजन दास एक मशहूर राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता सेनानी, वकील और पत्रकार थे। उन्हें लोग सम्मान से ‘देशबंधु’ भी कहते थे। एक जबरदस्त राष्ट्रवादी नेता के साथ-साथ वे एक कामयाब विधि-शास्त्री भी थे। स्वाधीनता आन्दोलन के चलते चित्तरंजन दास ने अलीपुर षड़यंत्र काण्ड में ‘अरविन्द घोष’ का समर्थन भी किया।

चित्तरंजन दास बहुत महान व्यक्ति थे, इन्होंने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए बाकी कई लोगों की तरह अपनी वकालत छोड़ दी और अपनी सारी संपत्ति और धन मेडिकल कॉलेज और उसके साथ-साथ बाकी अस्पतालों को दे दिया। कांग्रेस पार्टी के अंदर उनकी एक बहुत जरुरी जगह रही है और वे एक समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। कांग्रेस द्वारा ‘कौंसिल एंट्री’ को मना करने के बाद इन्होंने स्वराज पार्टी का गठन किया।

शुरूआती जीवन

चित्तरंजन दास का जन्म 5 नवंबर, 1870 को कोलकाता में हुआ था। वे ढाका के बिक्रमपुर के तेलिरबाग के प्रसिद्ध ‘दास परिवार’ से ताल्लुक रखते थे। चित्तरंजन दास के पिता का नाम ‘भुबन मोहन दास’ था, वे कोलकाता के उच्‍च न्‍यायालय के एक जाने-माने वकील थे।

सन् 1890 में चित्तरंजन दास ने बी.ए. पास की और उसके बाद वे आइ.सी.एस्‌. करने के लिए इंग्लैंड चले गये और सन् 1892 में वे बैरिस्टर बनकर भारत वापस आ गये। वे अपने पिता की ही तरह मशहूर वकील बनना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कोलकाता में वकालत शुरू कर दी। शुरू में तो उनकी वकालत कुछ अच्छी नहीं चली, मगर कुछ समय के बाद वे वकालत के क्षेत्र में जाने जाने लगे।

चित्तरंजन दास ने अपनी काबिलियत का परिचय तब दिया, जब वे ‘वंदेमातरम्‌’ के संपादक ‘श्री अरविंद घोष’ पर चल रहे राजद्रोह के मुकदमे में उनकी तरफ से लड़े और फिर मानसिकतला बाग षड्यंत्र के मुकदमे ने इन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट में काफी मशहूर कर दिया था। इस मुकदमे के चलते चित्तरंजन दास ने बिना अपने मतलब के बहुत मेहनत करते हुए वकालत में अपनी काबिलियत का परिचय दिया, जिसकी वजह से वे पूरे भारत में मशहूर हो गये। जब भी चित्तरंजन दास क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों का मुकदमा लड़ते थे, वे अपनी फीस नहीं लेते थे।

राजनीतिक जीवन

सन् 1906 में चित्तरंजन दास ने कांग्रेस की सदस्यता प्राप्त की और सन् 1917 में वे बंगाल की प्रांतीय राजकीय परिषद् के अध्यक्ष चुने गये। सन् 1917 में कांग्रेस के कलकत्ता सेशन में ‘एनी बेसंट’ को अध्यक्ष बनाने में इनका भी योगदान था। कांग्रेस पार्टी के अंदर चित्तरंजन दास को उनकी उग्र नीतियों के लिए जाना जाता था और इसी वजह से ‘सुरेंद्रनाथ बनर्जी’ ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और चले गये। सन् 1918 में चित्तरंजन दास ‘रौलट कानून’ के खिलाफ खड़े रहे और उसका विरोध करते रहे, साथ ही वे गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन का समर्थन करते रहे।

चित्तरंजन दास ने भारत की आजादी के लिए अपनी अच्छी खासी वकालत छोड़ दी और असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपना अच्छा खासा जीवन छोड़कर सारे देश में भ्रमण करना शुरू कर दिया और साथ ही इन्होंने कांग्रेस के सिद्धान्तों का प्रचार किया। चित्तरंजन दास ने अपनी सारी संपत्ति राष्ट्रीय हित के लिए दान कर दी। इसके बाद उन्हें कलकत्ता के नगर प्रमुख निर्वाचित के तौर पर चुना गया और इसी चुनाव में सुभाषचन्द्र बोस को कलकत्ता निगम के मुख्य कार्याधिकारी बनाया गया। इसके बाद ही कलकत्ता निगम यूरोपीय नियंत्रण से आजाद हो सका।

असहयोग आंदोलन के चलते कई विद्यार्थियों ने स्कूल और कॉलेज छोड़ दिया था, इसलिए  चित्तरंजन दास ने ढाका में राष्ट्रीय विद्यालय को स्थापित किया। इन्होंने कांग्रेस पार्टी की कई तरह से मदद की। अंग्रेजी सरकार द्वारा असहयोग आंदोलन को अवैध घोषित कर देने के बाद चित्तरंजन दास को भी गिरफ्तार कर के 6 महीनों के लिए जेल में डाल दिया था। उनकी पत्नी ‘बसंती देवी’ पहली महिला थी, जो असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार हुई थी। सभी स्वाधीनता सेनानी बसंती देवी की बहुत इज्जत करते थे और सुभाष चन्द्र बोस तो उन्हें माँ कहते थे।

सन् 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद के सेशन का अध्यक्ष चित्तरंजन दास को ही चुना गया था, मगर इनके जेल में होने की वजह से यह मौका इनके प्रतिनिधि के रूप में ‘हकीम अजमल खाँ’ को मिला। जेल से बहार आने के बाद उन्होंने कौंसिल एंट्री की नई नीति तैयार की, मगर कांग्रेस ने इनकी यह नीति स्वीकार नहीं की और इसकी वजह से इन्होंने अपने अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया और ‘मोतीलाल नेहरु’ और ‘हुसैन शहीद सुहरावर्दी’ के साथ मिलकर स्वराज्य दल को स्थापित किया। कुछ समय बाद 1923 में कांग्रेस ने उनकी कौंसिल एंट्री के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

चित्तरंजन दास के बनाये हुए दल को बंगाल परिषद् में बिना किसी विरोध के चुना गया, मगर चुने जाने के बाद भी इन्होंने मंत्रिमंडल बनाने से मना कर दिया और फिर एक-एक कर मांटफोर्ड सुधारों के लक्ष्यों की दुर्गति कर डाली। सन्‌ 1924-25 तक वे कलकत्ता नगर महापालिका के मेयर के पद पर रहे। इस समय स्वराज्य पार्टी का कांग्रेस पार्टी पर पूरा वर्चस्व था। इन्होंने कांग्रेस के पटना सेशन में कांग्रेस का सदस्य बनते वक्त सूत कातने की अनिवार्य शर्त को ऐच्छिक कर दिया।

मृत्यु

सन् 1925 के बाद ज्यादा काम की वजह से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ने लगा और मई के महीने में वे दार्जिलिंग चले गये, ताकि अपना इलाज करा सकें। उन्हें देखने के लिए गांधी जी भी दार्जिलिंग चले गये, पर उनकी सेहत पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा और 16 जून 1925 को तेज़ बुखार आने की वजह से उनका देहांत हो गया।

उनकी मृत्यु के बाद गांधी जी के नेतृत्व में कोलकाता से उनकी अंतिम यात्रा निकली गई और गाँधी जी ने कहा था – “देशबंधु एक महान आदमी थे, उन्होंने केवल एक सपना देखा था और वो भारत की आजादी का था, उनके हिसाब से हिन्दू और मुसलमान में कोई अंतर नहीं होता और इतना ही नहीं मैं अंग्रेजों को भी ये बताना चाहता हूँ कि देशबंधु के दिल में उनके लिए भी कोई बुरे भाव नहीं थे।“