ब्रह्मचारिणी देवी | Brahmacharini Devi

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नवरात्र के दूसरे दिन श्रद्धालु ध्यान लगाकर माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं। देवी ब्रह्मचारिणी तप की शक्ति का प्रतिक हैं। माँ का यह स्वरूप भक्तों को अनंत फल देता है।

सर्वव्यापी ब्रह्मांडीय चेतना का स्वरूप, माँ ब्रह्मचारिणी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। ब्रह्म का अर्थ वह परम चेतना है, जिनका न तो कोई आदि है न कोई अंत, जिसके पास कुछ भी नहीं है। नवरात्र के दूसरे दिन भक्त ध्यान लगाकर माँ के ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना करते हैं। माँ के इस स्वरूप की पूजा करने वालों की शक्तियाँ अनंत हो जाती हैं, उसके सभी दुःख दूर होते हैं और वे सुखों की अनुभूति प्राप्त करते हैं।

सत, चित्त, आनंदमय ब्रह्म की प्राप्ति करना ही ब्रह्मचारिणी का स्वभाव है। चन्द्रमा के समान निर्मल, कांतिमय और भव्य रूप वाली, दो भुजाओं वाली माँ ब्रह्मचारिणी कौमारी शक्ति का स्थान योगियों ने ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ में बताया है। इनके एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में चन्दन की माला रहती है। अपने भक्तों को माँ ब्रह्मचारिणी सभी कार्यों में सफल होने में मदद करती हैं। पर्वत की चोटी को इनकी सवारी बताया गया है। मान्यता यह है कि दुर्गा का यह रूप साधकों को अमोघ फल प्रदान करता है। साधक को यश, सिद्ध और सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है।

नवरात्रों में दूसरी देवी माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण-ज्योर्तिमय है। वे गहन ताप में लीन हैं, देवी का मुख दिव्य तेज से भरा है और भंगिमा शांत है। मुखमंडल पर विकट तपस्या के कारण अद्भुत कांति का अनूठा संगम है, जिससे तीनों लोक प्रकाशमान हो रहे हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त माँ ब्रह्मचारिणी का व्रत करता है, वह कभी अपने जीवन में नहीं भटकता अपने मार्ग पर स्थिर रहता है और जीवन में सफलता प्राप्त करता है।

आराधना मंत्र

प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ ब्रह्मचारिणी की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में दूसरे दिन इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ: हे माँ सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।

माँ ब्रह्मचारिणी की आरती

“जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो ​तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।”