परिचय

बीरबल साहनी एक बहुत ही मशहूर अंतरराष्ट्रीय  पुरावनस्पति वैज्ञानिक थे। बीरबल साहनी की दिलचस्पी पुरावनस्पति के साथ-साथ भूविज्ञान और पुरातत्व में भी थी। इन्होंने ही सन् 1946 में लखनऊ में स्थित ‘बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान’ की स्थापना की थी। इनका सबसे बड़ा योगदान भारत के जीवाश्म पौधे और पौधों के विकास के बारे में इनकी रिसर्च थी। बीरबल साहनी भारतीय विज्ञान शिक्षा की स्थापना में भी शामिल थे और भारत के राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष भी थे।

प्रारंभिक जीवन

बीरबल साहनी का जन्म 14 नवंबर 1891 को भेड़ा नामक एक छोटे व्यापारिक नगर में हुआ, जो पश्चिमी पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के शाहपुर जिले में स्थित था। इनके पिता का नाम ‘रुचि राम साहनी’ था, वे रसायन के प्राध्यापक थे।

शिक्षा

बीरबल साहनी की शुरुआती शिक्षा लाहौर में ‘सेन्ट्रल मॉडल स्कूल’ से शुरू हुई और फिर स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के लिए वे केंब्रिज गए और उसी के साथ उन्होंने वहाँ  अन्वेषण कार्य भी शुरू कर दिया। बीरबल साहनी ने  केवल छात्रवृत्ति की मदद से शिक्षा हासिल की, वे काफी अच्छे विद्यार्थी थे, जिस वजह से उन्हें छात्रवृत्तियां प्राप्त करने में कभी ज्यादा मुश्किल नहीं हुई। सन् 1911 में बीरबल साहनी ने पंजाब विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. की परीक्षा पास की।

प्रोफेसर ‘रुचि राम साहनी’ ने उच्च शिक्षा के लिए अपने पांचों बेटों को मैनचेस्टर, इंग्लैंड भेज दिया और साथ में वे खुद भी मैनचेस्टर, इंग्लैंड चले गए। पहले विश्व युद्ध के दौरान वे  जर्मनी में थे और लड़ाई शुरू होने के एक दिन पहले जैसे-तैसे सीमा के पार एक सुरक्षित स्थान पर पहुच गए।

बीरबल साहनी का पहला शोधपत्र “न्यू फाइटोलॉजी” नाम की एक पत्रिका में छपा और उसके बाद वनस्पति शास्त्र की दुनिया में उनका नाम काफी जाना जाने लगा। उनका दूसरा शोधपत्र भी उसी साल “निफरोनिपेस बालियो बेलिस” में छपा। उन्होंने अपना शोध का कार्य जारी रखा और शाखाओं के विकास को लेकर “क्लिविल्स” में एक शोधपत्र लिखा और उस शोधपत्र को उन्होंने “शिड्बरी हार्डी’ पुरस्कार” के लिए भी भेजा। सन् 1917 में यह शोधपत्र “न्यू फाइटोलॉजी” पत्रिका में छपा।

करियर

सन् 1929 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने बीरबल साहनी के शोधों को मान्यता देते हुए उन्हें Sc. D. की उपाधि से सम्मानित किया गया। बीरबल साहनी को प्रयोगशाला में काम करने से ज्यादा अच्छा फिल्ड में काम करना पसंद था।

सन् 1933 में वे  लखनऊ विश्वविद्यालय के डीन  के पद पर विराजमान हुए। सन् 1943 में लखनऊ विश्वविद्यालय में भूगर्भ विभाग को स्थापित किया गया और बीरबल साहनी ने वहाँ पर अध्यापन का कार्य भी किया।

बीरबल साहनी ने कई अलग-अलग सभ्यताओं के बारे में अध्ययन किया और उनके निष्कर्ष निकाले, जिनमें हड़प्पा, मोहनजोदड़ो एवं सिन्धु घाटी की सभ्यता प्रमुख है।

उन्होने सिन्धु घटी सभ्यता के एक स्थल रोहतक  के उपर रिसर्च की और पता लगाया कि जो लोग सदियों पहले यहां रहा करते थे, वे खास तरह के सिक्कों को ढालना जानते थे। बीरबल साहनी ने चीन, रोम, उत्तरी अफ्रीका आदि देशों में भी सिक्के ढालने के खास तरीके का अध्ययन किया।

इतना ही नहीं बीरबल साहनी वनस्पति विज्ञान के एक बहुत बड़े ज्ञानी थे और वे अपना ज्ञान केवल अपने तक ही नहीं रखना चाहते थे। इसलिए वे छात्रों और नए वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन भी देते थे। विश्वविद्यालय के डीन होने की वजह से उन्हें जो खास भत्ता  मिलता था, उसे वे नए शोध कार्य कर रहे वैज्ञानिकों की मदद में लगाते थे।

इतनी सफलता पाने के बाद बीरबल साहनी एक ‘पैरा वनस्पति संस्थान’ स्थापित करना चाहते थे, जो एक मुश्किल काम था। मगर उनकी थोड़ी कोशिश के बाद ही उन्हें कामयाबी मिल गई और 3 अप्रैल 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘बीरबल साहनी संस्थान’ की आधारशिला रखी। बीरबल साहनी ने संस्थान के विकास के लिए कई देशों का दौरा किया, जिनमें कनाडा, अमेरिका, यूरोप और इंग्लैण्ड प्रमुख थे।

पुरस्कार व सम्मान

बीरबल साहनी ने अपने जीवन में  वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में बहुत जरुरी कार्य किये हैं, जिनकी वजह से उन्हें देश-विदेश में बहुत सम्मान मिला। सन 1930 और 1935 में उनकी नियुक्ती ‘विश्व कॉंग्रेस पैरा वनस्पति शाखा’ के उपाध्यक्ष के रूप में की गई। वे भारतीय विज्ञान कॉंग्रेस के 2 बार सन् 1921 और 1928 में अध्यक्ष चुने जा चुके थे।

सन् 1937-38 और सन् 1943-44 में बीरबल साहनी ‘राष्ट्रीय विज्ञान एकेडमी’ के प्रधान के पद पर रहे थे। सन् 1929 में कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय ने बीरबल साहनी को Sc. D. की उपाधि से सम्मानित भी किया था। सन् 1936-37 में लन्दन के ‘रॉयल सोसाइटी’ द्वारा वे फैलो निर्वाचित किए गए।

मृत्यु

बीरबल साहनी का देहांत 10 अप्रैल 1949 को उत्तर प्रदेश राज्य के लखनऊ शहर में हुआ।