हमारे देश में बहुत से डरावने स्थान हैं, लेकिन इस लिस्ट में सबसे ऊपर नाम भानगढ़ के किले का आता है, जिसे “भूतों का भानगढ़” नाम से ज्यादा जाना जाता है। भानगढ़ का किला राजस्थान राज्य के अलवर जिले में स्थित है। इस किले से कुछ किलोमीटर की दूरी पर विश्व प्रसिद्ध सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। भानगढ़ का किला तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सामरिक द्रष्टि से किसी भी राज्य के संचालन के लिए यह उपयुक्त स्थान है। सुरक्षा की दृष्टिकोण से इसे हिस्सों में बाँटा गया है। सबसे पहले एक ऊँची दीवार है, जिससे दोनों तरफ की पहाड़ियों को जोड़ा गया है। इस प्राचीर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी विराजित हैं। इसके बाद मार्केट आरंभ होता है, मार्केट की समाप्ति के पश्चात राजमहल की इमारत को विभाजित करने के लिए त्रिपोलिया द्वार बना हुआ है। इसके पश्चात राजमहल स्थित है। इस किले के अन्दर कई मंदिर हैं, जिसमें भगवान सोमेश्वर, गोपीनाथ, मंगला देवी और केशव राय के प्रमुख मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों की दीवारों और स्तंभों पर की गयी चित्रकारी से पता लगाया जा सकता है कि यह किला कितना रूपवान और आलीशान रहा होगा। सोमेश्वर मंदिर के पास में एक वापिका (तालाब) है, जिसमें अभी भी गाँव के आस-पास के लोग नहाते हैं।

भानगढ़ किला | Bhangarh Ka Qila | Bhangarh Fort in Hindi

भानगढ़ की कहानी बहुत ही दिलचस्प है, जो 300 सालों तक काफी खुशहाल रहता है। भानगढ़ की एक सुन्दर राजकुमारी रत्नावती को तांत्रिक सिंधु सेवड़ा चाहने लगता है। वह राजकुमारी को अपने वश में करने लिए काला जादू करता है, पर खुद ही अपने जादू का शिकार हो कर मर जाता है, लेकिन मरने से पहले भानगढ़ को बर्बाद होने का श्राप दे जाता है। आकस्मिक रूप से उसके एक माह बाद पडोसी राज्य अजबगढ़ से लड़ाई में राजकुमारी रत्नावती सहित समस्त भानगढ़ के निवासी मारे जाते हैं, जिसके कारण भानगढ़ वीरान हो जाता है। तब से तबाह हुआ भानगढ आज तक तबाह है। कहते है कि उस लड़ाई में मारे गए लोगों के भूत आज भी रात को भानगढ़ के किले में भटकते हैं, क्योंकि तांत्रिक के श्राप के कारण उनकी मुक्ति नहीं हो पाई थी। भानगढ़ की कहानी लगती फ़िल्मी है, लेकिन असली है।

किले का इतिहास

भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने सन. 1573 में बनवाया था। भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा था। मुग़ल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल भगवंत दास के छोटे बेटे व आमेर के मुगल सेनापति मानसिंह के छोटे भाई राजा माधोसिंह ने सन. 1613 में इसे अपनी रियासत बना लिया। माधोसिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया तथा वहीं पर रहने लगा। सन. 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली। औरंगजेब के शासन के दौरान हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान हो गए थे, जिन्हें भानगढ़ दे दिया गया। मुगलों के कमजोर पड़ने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इनको मारकर भानगढ़ पर अपना कब्जा कर लिया।

पौराणिक कथा

भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती बेहद खुबसुरत थी, जिनके रूप का जिक्र पूरे राज्य में था, तब उनकी उम्र लगभग 20 वर्ष की थी। उस समय कई राज्यों से उनके लिए विवाह के प्रस्ताव आ रहे थे। राजकुमारी एक बार किले से बाहर अपनी सहेलियों के साथ बाजार जाती हैं। राजकुमारी एक इत्र की दुकान पर इत्र को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी। उस दुकान से कुछ ही दूर सिंधु सेवड़ा नाम का तांत्रिक खड़ा होकर राजकुमारी को बहुत ही ध्यान से देख रहा था।

सिंधु सेवड़ा उसी राज्य में रहता था और वह काले जादू का महारथी था। तांत्रिक राजकुमारी के रूप का दिवाना था तथा वह राजकुमारी से अत्यधिक प्रेम करता था। वह किसी भी तरीके से राजकुमारी को हासिल करना चाहता था। तांत्रिक ने एक इत्र की बोतल जिसको राजकुमारी पसन्द कर रही थी, उस इत्र की बोतल पर काला जादू कर दिया, जो राजकुमारी को सम्मोहन करने के लिए किया था, लेकिन एक विश्वसनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इसके बारे में बता दिया था।

राजकुमारी ने उस इत्र की बोतल को एक पत्थकर पर फेंक दिया। पत्थर पर फेंकते ही वो बोतल टूट गयी तथा इत्र उस पत्‍थर पर फैल गया। इसके बाद वह पत्थर फिसलते हुए तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। मरने से पहले तांत्रिक ने श्राप दिया था कि इस किले में रहने वाले सभी लोग शीघ्र ही मर जायेगे और दोबारा कभी भी जन्म नहीं ले सकेंगे तथा जिन्दगी भर उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी।

तांत्रिक की मृत्यु के एक माह बाद ही भानगढ़ और अजबगढ के बीच युद्ध हुआ, जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मर गये। यहाँ तक कि राजकुमारी भी उस श्राप से नहीं बच सकी और उनकी भी मृत्यु हो गयी। किले में एक साथ इतने बड़े कत्लेआम के बाद वहाँ पर मौत की चीखें गूंज गयी, जिनकी आत्माएं आज भी किले में भटकती हैं।

किले में सूर्यास्त के बाद जाना मना है

फिलहाल इस किले की देख-रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है। किले के चारों तरफ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम मौजूद रहती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण टीम ने सख्‍त हिदायत दे रखी है कि सूर्यास्‍त के बाद इस इलाके में किसी भी व्‍यक्ति के ठहरने के लिए मनाही है। इस किले में जो भी व्यक्ति सूर्यास्‍त के बाद गया, वो कभी वापस नहीं आया है। कई बार लोगों को आत्माओं ने परेशान किया है और कुछ लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है।

समय – इस किले को देखने का समय सुबह 9 बजे से शाम को 6 बजे तक का है।

किलों की तालिका

क्र संकिले का नामनिर्माण वर्षनिर्माणकर्तास्थान
1लक्ष्मणगढ़ किलासन. 1862 राजा लक्ष्मण सिंहसीकर, राजस्थान
2गागरोन किला12वीं शताब्दीराजा बीजलदेवझालावाड, राजस्थान
3मदन महल किलासन. 1100राजा मदन सिंहजबलपुर, मध्य प्रदेश
4ग्वालियर किला14 वीं सदीराजा मानसिंह तोमरग्वालियर, मध्य प्रदेश
5रणथंभोर किलासन. 944चौहान राजा रणथंबन देवसवाई माधोपुर, राजस्थान
6जूनागढ़ किलासन. 1594राजा रायसिंहबीकानेर, राजस्थान
7मेहरानगढ़ किलासन. 1459राव जोधाजोधपुर, राजस्थान
8लोहागढ़ किलासन. 1733महाराजा सूरजमल भरतपुर, राजस्थान
9कुम्भलगढ़ किलासन. 1458राजा महाराणा कुम्भाराजसमन्द, राजस्थान
10भानगढ़ किलासन. 1573राजा भगवंत दासअलवर, राजस्थान
11आगरा किलासन. 1565अकबरआगरा, उत्तर प्रदेश
12लाल किलासन. 1648शाहजहाँदिल्ली
13पुराना किला16 वीं शताब्दीशेरशाह सूरीदिल्ली