भगवान दास की जीवनी | Bhagwan Das Biography in Hindi

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परिचय

डॉ. भगवान दास विभिन्न भाषाओं के प्रकांड पंडित, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवी और शिक्षा शास्त्री के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें देश की भाषा, संस्कृति को सुदृढ़ बनाने वाले, स्वतंत्र और शिक्षित भारत के मुख्य संस्थापकों में गिना जाता है।

जन्म

भगवान दास का जन्म 12 जनवरी, 1869 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हुआ। उनके पिता का नाम ‘साह माधव दास’ था, जो वाराणसी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और धनी व्यक्तियों के बीच जाने जाते थे। धन और प्रतिष्ठा से भगवान दास का संबंध उनके पूर्वजों के समय से ही था। धनी परिवार में जन्म लेने के बाद भी वे बचपन से ही भारतीय सभ्यता और संस्कृति के सांचे में ढले थे।

शिक्षण एवं कार्य

भगवान दास की शुरूआती शिक्षा वाराणसी में हुई। उस समय अंग्रेज़ी का बहुत प्रसार था, किंतु उन्होंने अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिन्दी, अरबी, उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, भाषाओं का भी गहन अध्ययन किया। बचपन से ही वे पढ़ने-लिखने में बहुत तेज़ थे। उन्होंने 12 वर्ष की आयु में ही हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली थी। इसके बाद वाराणसी के ही ‘क्वींस कॉलेज’ से 12वीं और बी.ए. की परीक्षा संस्कृत, दर्शन शास्त्र, मनोविज्ञान और अंग्रेज़ी विषयों के साथ प्रथम श्रेणी में पास की।

इसके बाद भगवान दास को आगे की शिक्षा के लिए कोलकाता भेजा गया। वहाँ से उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया। उन्होंने सन् 1887 में 18 वर्ष की आयु में ही पाश्चात्य दर्शन में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने एम.ए. की परीक्षा पास करने के बाद पिता के कहने पर बिना इच्छा के डिप्टी कलेक्टर के पद पर सरकारी नौकरी की। नौकरी करते हुए भी वे अध्ययन और लेखन कार्य में लगे रहे।

भगवान दास ने 23- 24 वर्ष की आयु में ही ‘साइंस ऑफ पीस’ तथा ‘साइंस ऑफ इमोशन’ नामक पुस्तकों की रचना की। उन्होंने लगभग 8-10 वर्ष तक सरकारी नौकरी की और पिता का निधन होने पर नौकरी छोड़ दी।

इस दौरान एक तरफ जहां देश की स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन हो रहे थे, वहीं दूसरी तरफ अंग्रेज़ी शासन के कारण भारतीय भाषा, सभ्यता और संस्कृति विलुप्त हो रही थी और उसे बचाने के लिए प्रयास किये जा रहे थे। विख्यात समाज सेविका एनी बेसेंट ऐसे ही प्रयासों के अंतर्गत वाराणसी में कॉलेज की स्थापना करने का प्रयास कर रही थीं। वे एक ऐसा कॉलेज बनाना चाहतीं थीं, जो अंग्रेज़ी प्रभाव से मुक्त हो।

जब भगवान दास को इस बात का पता चला, तो उन्होंने इस उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास किया। उन्हीं के प्रयासों के कारण वाराणसी में ‘सैंट्रल हिन्दू कॉलेज’ की स्थापना हुई। इसके बाद पं. मदनमोहन मालवीय ने वाराणसी में ‘हिन्दू विश्वविद्यालय’ स्थापित करने के बारे में सोचा, तब भगवान दास ने उनके साथ मिलकर ‘काशी हिन्दू विद्यापीठ’ की स्थापना में अमूल्य योगदान दिया और ‘सैंट्रल हिन्दू कॉलेज’ का ‘काशी हिन्दू विद्यापीठ’ में विलय कर दिया। वे काशी विद्यापीठ के संस्थापक सदस्य ही नहीं, उसके प्रथम कुलपति भी बने।

लेखन कार्य

भगवान दास ने हिन्दी और संस्कृत भाषा में 30 से भी ज्यादा पुस्तकें लिखीं।  भारतीय दर्शन पर उनकी अंतिम पुस्तक सन् 1953 में प्रकाशित हुई।

स्वतंत्रता में योगदान

भगवान दास ने देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को भी निभाया। 1921 के ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ में भाग लेने पर उन्हें जेल में ड़ाल दिया गया। इसके बाद ‘असहयोग आन्दोलन’ में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। असहयोग आन्दोलन के दौरान वे काशी विश्वविद्यालय के कुलपति थे। 1922 में वाराणसी के म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस को भारी बहुमत से जितवाया और म्यूनिसिपल कमेटी के अध्यक्ष चुने गये। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अनेक सुधार कार्य कराये। साथ ही वह अध्ययन और अध्यापन कार्य से भी जुड़े रहे, विशेष रूप से हिन्दी भाषा के उत्थान और विकास में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

भगवान दास ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में कई कार्य किये। इन कार्यों के की वजह से उन्हें अनेक विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की मानद उपाधियों से विभूषित किया गया। वे सन् 1935 के कौंसिल के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विधानसभा के सदस्य चुनें हुए। बाद में वे सक्रिय राजनीति से दूर रहने लगे और भारतीय दर्शन और धर्म, अध्ययन और लेखन कार्य में व्यस्त हो गए।

भगवान दास ‘वसुदैव कुटंबकम’ अर्थात् ‘सारा विश्व एक ही परिवार है’ की भावना रखने वाले थे, उन्होंने सम्पूर्ण विश्व के दर्शन और धर्म को प्राचीन और सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप एक नया दृष्टिकोण दिया।

व्यक्तित्व

भगवान दास गृहस्थ थे, फिर भी वे संन्यासियों की तरह साधारण वेशभूषा में रहते थे। सन् 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब उनकी देशसेवा को देखते हुए सरकार ने उनसे महत्त्वपूर्ण पद संभालने का अनुरोध किया, किंतु उन्होंने विनयपूर्वक अस्वीकार कर दर्शन, धर्म और शिक्षा के क्षेत्र को ही प्राथमिकता दी।

पुरस्कार

सन 1955 में भारत सरकार की तरफ से तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया।

निधन

18 सितम्बर 1958 में लगभग 90 वर्ष की आयु में डॉ. भगवान दास का निधन हो गया।