बया | Baya | Baya weaver in Hindi

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बया का वैज्ञानिक नाम प्लोसिअस (Ploceus) है और अंग्रेजी में इसको बया वीवर (Baya Weaver) कहते हैं। बया की दो प्रजातियाँ पाई जाती हैं, पहली जिसका गला काले रंग का होता है और दूसरी जिसका सर पीले चमकीले रंग का होता है। बया को प्रकृति ने घोसला बनाने की महारत दी है, इनका घोसला सभी पक्षियों से अधिक सुन्दर और टिकाऊ होता है। बया अपना तूंबीनुमा घोसला बनाने के लिए काफी प्रचलित है। बया पक्षी समूह में ही रहना पसंद करते हैं और समूह में रहकर ये काफी शोरगुल करते हैं। बया समूह में उड़ते समय अलग-अलग तरह के जटिल करतब भी करते हैं। ये अपना आहार खेतों से प्राप्त करते हैं और कभी-कभी पकने वाली फसलों को हानि भी पहुँचा देते हैं। मादा और नर बया में कुछ ख़ास फर्क नहीं होता, दोनों लगभग मादा गौरैया के समान दिखते हैं। इनका कद बहुत छोटा होता है और चोंच मोटी होती है।

निवास

बया अपना घोसला पानी के निकट के पेड़ों पर बनाते हैं, जिससे इनके बच्चों को परभक्षियों से सुरक्षा मिल सके। यह पक्षी एकमात्र ऐसे पक्षी हैं, जहाँ घोसले का प्रारंभ करना नर बया के द्वारा होने की परम्परा है। यह अपना घोसला बनाने के लिए दुसरे पक्षियों की तरह जमीन पर पड़े खर-पतवार का इस्तेमाल नहीं करते, वह ताजे और मजबूत खर-पतवार को अपनी चोंच से तोड़कर अपने घोसले बनाने का कार्य करते हैं। जब घोसले नर द्वारा आधे बन जाते हैं, तब वह विशेष तरह की आवाज निकालके मादा को अपने घोसलों की और आकर्षित करते हैं। मादा भी अपना साथी चुनने से पूर्व, अपनी समझ द्वारा सबसे पहले अपना और अपने होने वाले परिवार के लिए घोसला कितना टिकाऊ है इसकी जांच करती है जब मादा ये सुनिश्चित कर लेती है कि कोनसा घोसला उसके होने वाले परिवार के अच्छा और टिकाऊ है, तभी वह नर बया द्वारा दिए गए निमंत्रण को स्वीकार करती है। प्रजनन काल में पेड़ों पर बया के घोसलों से बसी पूरी बस्ती देखने को मिलती है। इस तरह आस-पास अपने घोसले बनाने का अर्थ अपनी जाति को सुरक्षित रखने से होता है।

लुप्तप्राय प्रजाति

बया का झूंड खेतों के आस-पास ही अपना डेरा बसाता है, जिससे उन्हें भोजन और अपने घोसले के लिए खत-पतवार आराम से मिल सके। वह अपने आहार के लिए खेतों में चुगते हैं, परन्तु आज किसान अपनी फसल की उपज को प्राप्त करने के लिए अधिक कीटनाशक दवा का इस्तेमाल अपनी फसलों कर रहे हैं। जिसके कारण फसलों में मिले विषैले पदार्थ से बया की मृत्यु हो जाती है। इससे पूर्व बया का झूंड पहले सरलता से देखने को मिल जाया करता था, परन्तु अब इन्हें देख पाना मुश्किल होता जा रहा है। गौरैया और कौए की तरह इनकी प्रजाति भी लुप्त होने की कगार पर आ चुकी है।