बाबा आमटे की जीवनी | Baba Amte Biography in Hindi

214

परिचय

बाबा आमटे का पूरा नाम डॉ. मुरलीधर देवीदास आमटे था। बाबा आमटे देश के प्रमुख सम्मानित समाजसेवी थे। बाबा आमटे ने समाज से निकाले हुये व्यक्ति और कुष्ठ रोगियों के लिये अनेक आश्रमों और समुदायों की स्थापना की। उन्हें नया जीवन जीने के लिये रास्ता दिया, जिसमें महाराष्ट्र राज्य के चन्द्रपुर शहर में स्थित “आनंदवन” का नाम मशहूर है।

इसके अतिरिक्त बाबा आमटे ने वन्यजीव सरंक्षण के लिए और समाज को जागरूक करने के लिए नई तरह के कार्यकलाप आरम्भ किए । बाबा आमटे ने नर्मदा को प्रदूषित होने से बचाने के लिए “नर्मदा बचाओ आन्दोलन” चलाया। उन्होंने अनेक गाँवों का भ्रमण किया और देखा कि भारतीय गाँव सचमुच ही खराब हालात में हैं। उस समय भारत गाँधी जी के नेतृत्व में आगे बढ रहा था और आजादी का संघर्ष तेजी से जोरों पर था। बाबा आमटे ने उसी समय अपने मित्र राजगुरु का साथ छोड़ दिया और गाँधी जी से मिलकर अहिंसा के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया।

बाबा आमटे गांवों में जाकर वहाँ के किसानों से मिले और उनकी समस्याओं के लिये आवाज उठाना शुरू कर दिया। बाद में बाबा आमटे विनोबा भावे से मिले, उन्होंने जगह-जगह भूमि सुधार आन्दोलन भी शुरू किया। बाबा आमटे के अच्छे कार्यों को देखते हुए सन. 1971 में उन्हें “पद्म श्री अवार्ड” से सम्मानित किया गया।

जन्म व बचपन

बाबा आमटे का जन्म 26 दिसम्बर सन. 1914 को महाराष्ट्र राज्य के वर्धा जिले में हिंगणघाट गाँवमें हुआ था। इनके पिता का नाम देवीदास हरबाजी आमटे था और उनकी माता का नाम लक्ष्मीबाई आमटे था। बाबा आमटे एक धनी परिवार से थे। बाबा आमटे के पिता शासक सम्बन्धी सेवा में लेखपाल थे। उनकी जमींदारी बरोड़ा से कुछ दुरी पर गोरजे गाँव में थी। बाबा आमटे का बचपन किसी राज्य के राजकुमार की तरह बहुत ही ठाट-बाट से बीता। उनकी विशिष्ट वेश-भूषा होती थी और पहनावा आम बच्चों से अलग दिखता था।

शिक्षा

बाबा आमटे की प्रारम्भिक शिक्षा “क्रिस्चियन मिशन स्कूल” से पूर्ण हुई। बाद में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय सेMA. LLB की शिक्षा पूर्ण की और कुछ समय तक वकालत भी की।

विवाह

बाबा आमटे का विवाह साधना आमटे के साथ हुआ था। साधना आमटे भी सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेती थीं और बाबा आमटे के साथ मिलकर जनता की सेवा करती थीं।

जीवन कार्य

विनोबा भावे, मदर टेरेसा और महात्मा गाँधी की तरह ही बाबा आमटे ने भी प्राणी मात्र में बसे नारायण की सेवा अपने आचरण में समाहित कर ख्याति प्राप्त की। बाबा आमटे एक बेहद संपन्न घराने से ताल्लुक रखते थे, उन्होंने जिन्दगी के सारे एशो-आराम त्यागकर स्वंय को गरीबों, दुखियों, कुष्ठ रोगियों की जिन्दगी को सुधारने में लगा दिया। इस लोक कल्याण कार्य की वजह से ही बाबा आमटे के जीवन को व्यक्ति आदर्श मानते है और उनके द्वारा बताये गए रास्तों पर चलने की सीख देते हैं। भारतीय समाज में जिन कुष्ठ रोगियों को अछूत की नजरों से देखा जाता है, उन्हें बाबा आमटे ने दिल से लगाया।

बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों के बारे में जानकारी एकत्रित की और एक आश्रम स्थापित किया, जहाँ आज भी कुष्ठ रोगियों की सेवा नि:शुल्क की जाती है और यह आश्रम “आनंदवन” के नाम से जाना जाता है। यहाँ आने वाले सभी रोगियों को बाबा आमटे ने एक मन्त्र दिया “श्रम ही है श्रीराम हमारा”। जो रोगी कभी समाज से अलग होकर रहते और भीख मागते थे, बाबा आमटे ने उन्हें श्रम के सहारे समाज में सर उठाकर जीना सिखाया। बाबा आमटे ने “आनंदवन” के अलावा और भी कई कुष्ठ रोगी सेवा संस्थानों की स्थापना की, जैसे सोमनाथ, अशोकवन आदि। जहाँ हजारों रोगियों की सेवा की जाती है और उन्हें रोगी से सच्चा कर्मयोगी बनाया जाता है। बाबा आमटे ने नर्मदा घाटी, सरदार सरोवर बाँध का निर्माण कराया और इसके फलस्वरूप हजारों आदिवासियों के विस्थापन का विरोध करने के लिए सन. 1989 में बाबा आमटे ने बाँध बनने से डूब जाने वाले स्थान में “निजी बल” नामक एक छोटा सा आश्रम बनाया था।

पुरस्कार

बाबा आमटे ने अनेक महान कार्य किये, इसलिए उन्हें बहुत सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। बाबा आमटे को भारत सरकार द्वारा सन. 1971 पद्मा श्री पुरस्कार, सन. 1985 में (फिलीपीन से) मैग्सेसे पुरस्कार, सन.1986 में पद्म विभूषण पुरस्कार और मानवाधिकार के क्षेत्र में योगदान के लिए सन. 1988 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सम्मान दिया गया।

मृत्यु

भारत के प्रसिद्ध समाजसेवी बाबा आमटे का देहांत 9 फरबरी सन. 2008 में महाराष्ट्र के “आनंदवन” में हुआ था।