अरविंदो घोष की जीवनी | Aurobindo Ghose Biography in Hindi

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परिचय

अरविंदो घोष एक स्वतंत्रता सेनानी, कवि, प्रकांड विद्वान, योगी और महान दार्शनिक थे। उन्होंने अपना जीवन भारत को आजादी दिलाने और पृथ्वी पर जीवन के विकास की दिशा में समर्पित कर दिया। अरविंदो घोष के पिता का नाम ‘कृष्णा धून घोष’ और माता का नाम ‘स्वर्णलोटा’ देवी था। उनके पिता एक डॉक्टर थे। अरविंदो घोष के नाना ‘राज नारायण बोस’ बंगाली साहित्य के एक जाने-माने नेता थे। अरविंदो घोष एक प्रभावशाली वंश से सम्बन्ध रखते थे। वे एक बहुमुखी प्रतिभा के अमीर व्यक्ति थे।

अरविंदो घोष का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था। जब वे 5 वर्ष के थे, तब उन्हें दार्जिलिंग के ‘लोरेटो कान्वेंट स्कूल’ में भेजा और 2 वर्ष के बाद सन 1879 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। उन्होंने अपनी पढाई लंदन के ‘सेंट पॉल’ स्कूल से पूर्ण की।

सन 1890 में 18 वर्ष की आयु में अरविंदो घोष को कैंब्रिज में दाखिला मिल गया। उन्होंने अपने पिता की इच्छा का पालन करने के लिए कैम्ब्रिज में रहते हुए ICS (Indian Civil Service) के लिए आवेदन भी दिया। उन्होंने सन 1890 में पूरे विश्वास के साथ ‘भारतीय सिविल सेवा परीक्षा’ उत्तीर्ण की, लेकिन वे घुड़सवारी की परीक्षा में सफल नही हो पाए, इसलिए उन्हें ICS में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली।

सन 1893 में अरविंदो घोष भारत वापस लौट आये और बड़ौदा के एक राजकीय विद्यालय में उप-प्रधानाचार्य बन गए। अरविंदो घोष को ‘ग्रीक’ और ‘लैटिन’ भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। सन 1893 से 1906 तक उन्होंने संस्कृत, बंगाली साहित्य, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान का विस्तृत रूप से अध्यन किया।

अरविंदो घोष ने सन 1906 में बंगाल के विभाजन के बाद अपनी नौकरी छोड़ दी। इसके बाद वो क्रांतिकारी आंदोलन में तेज़ी से सक्रिय हो गए, सन 1908 से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। अरविंद घोष भारत की राजनीति को जागृति करने वाले सलाहकारों में से एक थे। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक ‘वन्दे मातरम’ पत्रिका का प्रकाशन किया और निर्भीक होकर तीक्ष्ण सम्पादकीय लेख लिखे। उन्होंने ब्रिटिश सामान, ब्रिटिश न्यायालय और सभी ब्रिटिश चीजों के बहिष्कार का खुला समर्थन किया। उन्होंने लोगों से सत्याग्रह के लिए तैयार रहने के लिए कहा।

मशहूर ‘अलीपुर’ बम केस अरविंदो घोष के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। 1 वर्ष के लिए वे  अलीपुर सेंट्रल जेल के एकान्त कारावास में एक विचाराधीन कैदी रहे। वे अलीपुर जेल की एक गंदे सेल में थे, जब उन्होंने अपने भविष्य के जीवन का सपना देखा, जहाँ भगवान ने उन्हें एक दिव्य मिशन पर जाने का आदेश दिया। उन्होंने क़ैद की इस अवधि का उपयोग गीता की शिक्षाओं का गहन अध्ययन किया। ‘चित्तरंजन दास’ ने अरविंदो घोष का बचाव किया और एक यादगार सुनवाई के बाद उन्हें बरी कर दिया गया।

कारावास के समय में अरविंद घोष ने योग और ध्यान में अपनी दिलचस्पी बढ़ाई और रिहाई के बाद प्राणायाम का अभ्यास करना शुरू कर दिया। सन 1910 में अरविंदो घोष कलकत्ता छोड़कर पांडिचेरी चले गए।

पांडिचेरी में 4 वर्ष तक योग पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बाद सन 1914 में अरविंदो घोष ने आर्य नामक दार्शनिक मासिक पत्रिका का शुभारम्भ किया। अगले साढ़े 6 वर्षों तक यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से ज्यादातर के लिए एक माध्यम बन गया, जो एक धारावाहिक के रूप में आयीं। इनमें गीता का वर्णन, वेदों का रहस्य, उपनिषद, द रेनेसां इन इंडिया, वार एंड सेल्फ डिटरमिनेशन, द ह्यूमन साइकिल, द आइडियल ऑफ़ ह्यूमन यूनिटी और द फ्यूचर पोएट्री शामिल थीं। सन 1926 में अरविंदो घोष सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त हो गए।

अरविंदो घोष के दर्शनशास्त्र तथ्य, अनुभव, व्यक्तिगत आभाष और एकद्रष्टाया ऋषि की दृष्टि होने पर आधारित है। अरविंदो घोष का लक्ष्य केवल किसी व्यक्ति को उन बेड़ियों से जो उन्हें जकड़े हुए थीं और इसके एहसास से मुक्त करना नहीं था, बल्कि दुनिया में परमात्मा की इच्छा को सम्पन्न करना, एक आध्यात्मिक परिवर्तन लागू करना और मानसिक, मार्मिक, भौतिक जगत और मानव जीवन में दिव्यशक्ति और दिव्य आत्मा को लाना था।

अरविंदो घोष का निधन 5 दिसंबर 1950 को हुआ, उस समय वे 78 वर्ष के थे। उनके पार्थिव शरीर को देखने के लिए लगभग 60,000 लोग आए। भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने यौगिक दर्शन और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के लिए उनकी प्रशंसा की। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अखबारों ने उनकी मृत्यु का स्मरण किया।