अरुणा आसफ़ अली की जीवनी | Aruna Asaf Ali Biography in Hindi

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अरुणा आसफ़ अली की पहचान सन 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से हुई। वे आजादी की लड़ाई में एक नायिका के रूप में उभर कर सामने आईं और उस समय उन्होंने बहादुरी दिखाई। उन्होंने ‘गोवालिया टैंक मैदान’ (अगस्त क्रांति मैदान) मुम्बई में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के आगाज की सूचना दी। ऐसा कर वो उन हजारों युवाओं के लिए एक मिसाल बन गयीं, जो उनका अनुसरण कर देश की आज़ादी के लिए कुछ करना चाहते थे।

अरुणा आसफ अली का जन्म 16 जुलाई 1909 को कालका, पंजाब (वर्तमान हरियाणा) के एक रूढ़िवादी हिंदू बंगाली परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम ‘अरुणा गांगुली’ था। इनके पिता का नाम ‘उपेंद्रनाथ गांगुली’ तथा माता का नाम ‘अम्बालिका देवी’ था। नैनीताल में इनके पिता का होटल था। उन्होंने लाहौर और नैनीताल के ‘सेक्रेड हार्ट कान्वेंट’ में अपनी शिक्षा प्राप्त की। स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद, अरुणा आसफ अली ‘गोखले मेमोरियल स्कूल’ कलकत्ता में शिक्षका के तौर पर कार्य करने लगीं।

अरुणा गांगुली की मुलाकात इलाहबाद में ‘आसफ अली’ से हुई, जो विख्यात कांग्रेसी नेता थे और उन्होंने सन 1928 में अपने माता-पिता की बिना मर्जी के आसफ अली से शादी कर ली। वे उम्र में अरुणा गांगुली से 23 साल बड़े थे।

सन 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने सार्वजनिक सभाओं को सम्बोधित किया और जुलूस निकाला। उन पर ब्रिटिश सरकार ने आवारा होने का दोष लगाया और उन्हें 1 वर्ष की सजा सुनाई। गांधी-इर्विन समझौते के अंतर्गत सभी राजनीतिक बंदियों को बाहर कर दिया गया, लेकिन अरुणा आसफ़ अली को नही छोड़ा। परन्तु जब उनके पक्ष में एक जन आंदोलन हुआ, तब ब्रिटिश सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा।

अरुणा आसफ़ अली को सन 1932 में दोबारा बंदी बना लिया गया और तिहाड़ जेल में रखा गया। राजनीतिक कैदियों के साथ तिहाड़ जेल में हो रहे बुरे बर्ताव के खिलाफ में उन्होंने भूख हड़ताल की। उनके विरोध के कारण ही हालात में कुछ सुधार हुआ, लेकिन वे खुद अम्बाला के एकांत कारावास में चली गयीं। रिहा होने के बाद उन्हें 10 साल के लिए राष्ट्रीय आंदोलन से अलग कर दिया गया।

सन 1942 में उन्होंने अपने पति के साथ बॉम्बे के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया, जहाँ पर 8 अगस्त को ऐतिहासिक ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पारित होने के एक दिन बाद जब कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार किया गया, तब उन्होंने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में ध्वजारोहण कर आंदोलन की अध्यक्षता की। उन्होंने आंदोलन में एक नया जोश भर दिया।

अरुणा आसफ़ अली भारत छोड़ो आंदोलन में पूर्ण रूप से सक्रिय हो गईं और गिरफ़्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गईं। उनकी संपत्ति को सरकार द्वारा जब्त करके बेच दिया गया। सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए 50 हजार रुपए के ईनाम की घोषणा भी की। इस बीच वह बीमार पड़ गईं और यह सुनकर महात्मा गांधी ने उन्हें समर्पण करने की सलाह दी। 26 जनवरी 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया, तब उन्होंने खुद आत्मसमर्पण किया।

सन 1948 में अरुणा आसफ अली और समाजवादियों ने मिलकर खुद एक ‘सोशलिस्ट पार्टी’ बनाई। आजादी के समय वे ‘सोशलिस्ट पार्टी’ की सदस्या थीं। सोशलिस्ट पार्टी तब तक कांग्रेस की रूपरेखा का हिस्सा रही थी। सन 1955 में यह समूह भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़ गया और वे इसकी केंद्रीय समिति की सदस्य और ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की उपाध्यक्ष बन गईं।

सन 1958 में अरुणा आसफ अली ने भारत की ‘कम्यूनिस्ट पार्टी’ को छोड़ दिया और ‘दिल्ली नगर निगम’ की पहली मेयर नियुक्त की गईं। मेयर बनने के बाद उन्होंने दिल्ली की साफ-सफाई, विकास और स्वास्थ्य आदि अच्छे काम किए। सन 1964 में ‘जवाहरलाल नेहरू’ की मृत्यु के बाद वे दोबारा कांग्रेस पार्टी से जुड़ गयीं, पर सक्रिय रूप से भाग लेने से मना कर दिया। सन 1975 में उन्हें ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ और 1991 में अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान के लिए ‘जवाहर लाल नेहरू पुरुस्कार’ से सम्मानित किया गया।

29 जुलाई 1996 को अरुणा आसफ अली का देहांत हो गया। उस समय उनकी आयु 87 वर्ष थी। सन 1998 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ और भारतीय डाक सेवा द्वारा जारी किए गए एक ‘डाक टिकट’ से सम्मानित किया गया।