परिचय

अजमेर शरीफ दरगाह भारत के राजस्थान राज्य के अजमेर नगर में स्थित है। कहा जाता है कि अजमेर शरीफ दरगाह से आज तक कोई भी खाली हाथ नहीं लौटा, यहाँ पर जो भी मनौती मांगी जाती है, वह निश्चित ही पूर्ण होती है। अरावली की पहाड़ियों से घिरा अजमेर एक बहुत खुबसूरत स्थान है। लोग यहाँ श्रद्धा के साथ मन्नत मांगने आते हैं और मुराद पूर्ण हो जाने पर ख्वाजा का शुक्रिया अदा करने आते हैं। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती एक सूफी संत और इस्लामिक विद्वान थे, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में सूफियों को चिश्ती आदेश के परिचय व स्थापना में अपना जीवन व्यतीत किया। ख्वाजा साहिब ने अपना सम्पूर्ण जीवन गरीबों और दलितों की सेवा में समर्पित कर दिया। वह हमेशा ईश्वर से यही दुआ किया करते थे कि वह सभी भक्तों का दुःख-दर्द उन्हें दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे। अजमेर शरीफ दरगाह सभी धर्मों के लोगों के लिए पूजनीय है और प्रतिवर्ष यहाँ पर लाखों तीर्थयात्री आते हैं। चाँदी के दरवाजे वाली इस दरगाह का निर्माण कई भागों में हुआ है। यहाँ संत की मूल कब्र है जो संगमरमर की बनी हुई है, जिसके चारों तरफ चाँदी की रेलिंग है।

अजमेर शरीफ दरगाह | Ajmer Sharif Dargah in Hindi

इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार मांडू के सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने सन. 1465 में यहाँ दरगाह और गुम्बद का निर्माण करवाया था। अकबर के शासनकाल के दौरान भी दरगाह का बहुत विकास हुआ। दरगाह अजमेर शरीफ का मुख्य द्वार निजाम गेट कहलाता है, क्योंकि इसका निर्माण सन. 1911 में हैदराबाद स्टेट के उस समय के निजाम मीर उस्मान अली खान ने करवाया था। उसके पश्चात मुग़ल सम्राट शाहजहाँ द्वारा निर्माण किया गया “शाहजहाँनी दरवाजा” आता है। दरगाह के अन्दर उत्तम चित्रकारी से किया हुआ एक चाँदी का कटघरा है, जिसके अन्दर ख्वाजा साहब की कब्र है। यह कटघरा जयपुर के महाराज जयसिंह ने बनवाया था। दरगाह में एक खुबसूरत महफ़िल खाना भी है, जहाँ ‘कव्वाल’ ख्वाजा की शान में कव्वाली गाते हैं। उन्होंने कभी भी अपने उपदेश किसी भी किताब में नहीं लिखे और ना ही उनके किसी शिष्य ने उन शिक्षाओं को संकलन किया। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने सदैव राजशाही, लोभ और मोह का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अपने आचरणों को नदी की तरह पावन और पवित्र बनाओ तथा किसी भी तरीके से इनको दूषित न होने दो। सभी धर्मों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए और धार्मिक सहिष्णुता रखनी चाहिए। गरीबों पर हमेशा करुणा करनी चाहिए तथा जिस प्रकार संभव हो उसकी सहायता करनी चाहिए। दुनिया में ऐसे लोग लोग हमेशा पूजे जाते हैं और मानवता की मिसाल कायम करते हैं।

ऐसा मानना है कि सन. 1195 में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती मदीना (सऊदी अरब) से भारत आये थे। वे ऐसे समय भारत आये जब मुहम्मद गौरी की फ़ौज अजमेर के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस गजनी की तरफ भाग रही थी। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती कुछ समय तक दिल्ली में रुके, उसके बाद लाहौर चले गए। काफी समय तक लाहौर में रहने के बाद मुइज्ज अल उद्दीन के साथ अजमेर आ गये और वहीं पर रहने लगे।

जब संत की आयु लगभाग 90 वर्ष की थी, तब उन्होंने प्रार्थना करने के लिए स्वयं को 6 दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया और अपने नाशवान शरीर का त्याग कर दिया। बाद में इनके चाहने वालों ने उस स्थान पर मकबरा बना दिया, जिसे आजकल ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का मकबरा कहते हैं।

अजमेर शरीफ दरगाह कुछ महत्वपूर्ण जानकारी

  • चिश्ती दरगाह अजमेर शरीफ दरगाह या अजमेर शरीफ के नाम से भी विख्यात है। इस दरगाह को भारत सरकार दरगाह ख्वाजा साहेब एक्ट 1955 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है। भारत सरकार ने दरगाह के लिए समिति बनाई है, जो कि दरगाह में आने वाले चढ़ावे का हिसाब रखती है।
  • एक बार बादशाह अकबर ने दरगाह शरीफ में दुआ मांगी कि यदि उन्हें पुत्र प्राप्त होगा तो वो पैदल चलकर जियारत पेश करने आयेंगे। सलीम को पुत्र रूप में प्राप्त करने के बाद अकबर ने आगरा से 437 किलोमीटर दूर अजमेर शरीफ तक की यात्रा पैदल नंगे पैर चलकर की थी।
  • इग्लैंड की महारानी विक्टोरिया हो या बराक ओबामा, सुपरस्टार दिलीप कुमार, ओमप्रकाश, महमूद, सुनील दत्त, नर्गिस, अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, तब्बू, अक्षय कुमार, कैटरीना कैफ, अजय देवगन, काजोल से लेकर संजय दत्त तक ख्वाजा के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं।
  • इस दरगाह पर केवल मुस्लिम ही नहीं बल्कि हर धर्म के लोग बड़ी श्रद्धापूर्वक आते हैं।
  • दरगाह के बरामदे में दो बड़ी देग रखी हुई हैं। इन देगों को बादशाह अकबर और जहाँगीर ने चढ़ाया था। तब से लेकर आज तक इन देगों में काजू, बादाम, पिस्ता, इलायची, केसर के साथ चावल पकाया जाता है और गरीबों में बाँटा जाता है।
  • दरगाह अजमेर शरीफ एक ऐसा पाक-शफ्फाक नाम है, जिसे सुनने मात्र से ही रूहानी सुकून मिलता है। अजमेर शरीफ में हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की मजार की जियारत कर दरूर ओ फातेहा पढ़ने की चाहत हर ख्वाजा के चाहने वाले की होती है।