आर्य समाज की स्थापना कब हुई (Aarya samaj ki sthapana kab hui thi)

आर्य समाज की स्थापना सन् 1857 में स्वामी दयानंद सरस्वती के द्वारा की गई थी । स्वामी दयानंद सरस्वती को आर्य समाज की स्थापना करने की प्रेरणा मथुरा के स्वामी विरजानंद  से मिली थी । आर्य समाज से संबंधित लोग वैदिक परंपराओं में विश्वास रखते हैं । आर्य समाज के लैगअवतारवाद, कर्मकांड, अंधविश्वास, मूर्ति पूजन को नकारते हैं । आर्य समाज से संबंधित लोग छुआछूत और जातिवाद जैसी सामाजिक बीमारियों का भी विरोध करते हैं । आर्य समाज से संबंधित स्त्रियों और शुद्रो को यज्ञ करने और वेदों का अध्ययन करने का भी अधिकार होता है । स्वामी दयानंद सरस्वती ने एक ग्रंथ भी लिखा था जो सत्यार्थ प्रकाश नामक आर्य समाज के प्रमुख पवित्र और मान्य ग्रन्थों में से एक हैं। इस समाज का एक आदर्श वाक्य “ कृण्वन्तोविश्वमार्यम” जिसका अर्थ होता हैं  “ पूरे विश्व को आर्य बनाते चलते चलो”।

आर्य समाज की स्थापना कब हुई

आर्य समाज का इतिहास –

आर्य समाज की स्थापना 10 अप्रैल 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने मुम्बई में की थी । इस समाज की स्थापना से पहले स्वामी दयानंद सरस्वती ने 7 सितंबर सन् 1872 में बिहार में आर्य समाज की स्थापना की थी । पर ये आर्य समाज ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया और स्वामी दयानंद सरस्वती के बिहार छोड़ने के बाद बिहार में आर्य समाज का अस्तित्व ही खत्म हो गया । इसके बाद स्वामी दयानंद ने 3 वर्ष के बाद बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की ।

आर्य समाज की पूजन करने की मान्यता –

आर्य समाज की मान्यता है कि ईश्वर  निराकार है तथा ईश्वर का सर्वोत्तम और निज नाम “ओम हैं । इस ओम शब्द में सभी गुण विद्यमान होते हैं । इसलिए ओम का नाम ब्रह्मा, विष्णु, गणेश देवी, शनि, महेश, अग्नि हैं । इसलिए जब एक ही नाम में सभी ईश्वर के नाम उपस्थित है तो अलग अलग नामों से मूर्ति पूजा करना भी तो उचित नहीं है । आर्य समाज वर्णव्यवस्था को कर्म के आधार पर माना जाता हैं । आर्य समाज के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति चार अरब 32 करोड़ काल से हुई थी । और इतना ही समय सृष्टि के प्रलय का भी हैं ।  आर्य समाज में वैदिक धर्म को पूरी दुनिया में स्थापित करने के निरन्तर प्रयास किये जा रहें हैं । तथा उनके वैदिक राष्ट्र में बीड़ी, सिगरेट, मांस, मदिरा, चाय, मिर्च – मसाले की कोई जगह नहीं है ।

आर्य समाज के नियम –

* आर्य समाज का नियम है कि इसमें सभी को सिर्फ अपने खुद के हित के बारे में सोचने का अधिकार नहीं है बल्कि आर्य समाज के लोगों को ऐसे कार्य करना चाहिए जो पूरे समाज की तरक्की में मददगार हो ।

* आर्य समाज का नियम है कि समाज में अविधा का नशा और विधा दोनों की वृद्धि करनी चाहिए ।

* आर्य समाज के नियम के अनुसार इन्सान को प्रत्येक कार्य धर्म के अनुसार ही करना चाहिए अर्थात् इन्सान को सभी कार्य सत्य और असत्य को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

* आर्य समाज के नियम के अनुसार मनुष्य को हमेशा सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागकर ही चलना चाहिए।

* आर्य समाज के नियम के अनुसार आर्य समाज के सभी सदस्यों को वेदों में सत्य का ज्ञान और वेदों में सत्य की सभी विधाओं का ज्ञान होना आवश्यक है क्योंकि यह आर्य समाज के सदस्यों का अधिकार हैं ।

* आर्य समाज के नियम के अनुसार आर्य समाज के सभी सदस्यों  ईश्वर की निराकार, सत्य, दयालु, सर्वव्यापक, अनादी, अनुपम, पवित्र, न्यायकारी, सर्वाधार, अभय, सृष्टिकर्ता और अमर है।  और उनकी ईश्वर की उपासना करना आर्य समाज का अधिकार है ।

* आर्य समाज के नियम के अनुसार जो सत्य विधा और प्रदार्थवाधा के नाम से जाने जाते हैं उनका आदिमूल परमेश्वर ही होते हैं ।

* आर्य समाज का उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और धार्मिक उन्नति करना ही हैं ।

*आर्य समाज का उद्देश्य संसार में सभी मनुष्यों को सभी को एक दूसरे के साथ  प्रीति पूर्वक, यथा योग्य और धर्मानुसार रहने का व्यवहार सिखाना है ।

* आर्य समाज के नियम अनुसार सभी सदस्यों को सामाजिक , सर्व हितकारी नियम के अनुसार ही रहना चाहिए ।

आर्य समाज का समाज के उत्थान के लिए किए गए योगदान –

* आर्य समाज सिर्फ धार्मिक संस्थाओं में ही नहीं बल्कि समाज सुधारक की तरह राष्ट्र प्रेम को जागृत करने का भी आन्दोलन है

* स्वामी दयानंद सरस्वती ने धरम परिवर्तित किया और इसके बाद उन्होंने हिन्दू धर्म को अपनाने के लिए पूरे देश में शुद्धी आन्दोलन चलाया ।

* आज जो हम “नमस्ते” शब्द का इस्तेमाल करते हैं इसका भी उपयोग स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही भारतीय संस्कृति को फिर से जागृत कर इस शब्द का प्रचार प्रसार किया |