भारत देश में अनेकों त्योहार की तरह मुस्लिम धर्म में हर साल 2 बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं। एक ईद-उल-फित्र, दूसरा ईद-उल-अजहा।

ईद-उल-अजहा के मौके पर मुस्लिम धर्म में नमाज पढ़ने के साथ-साथ जानवरों की कुर्बानी भी दी जाती है। इस्लाम धर्म के अनुसार, कुर्बानी करना हजरत इब्राहिम की सुन्नत है, जिसे अल्लाह ने मुसलमानों पर वाजिब कर दिया है। ईद-उल-अजहा का जश्न 3 दिन तक बड़ी धूम से मनाया जाता है। इसी हिसाब से कुर्बानी का सिलसिला भी ईद के दिन को मिलाकर तीन दिनों तक चलता है। ईद के मौके पर बाजारों की रौनक देखने को बनती है। मुस्लिम धर्म के लोग अल्लाह की रजा के लिए कुर्बानी करते हैं। इस्लाम के मुताबिक, सिर्फ हलाल तरीके से कमाए हुए पैसों से ही कुर्बानी जायज मानी जाती है।

इस्लाम धर्म में कुर्बानी का महत्व

इस्लाम धर्म में कुर्बानी का काफी महत्व है। कुरान में कई जगह जिक्र किया गया है कि अल्लाह ने करीब 3 दिनों तक हजरत इब्राहिम को ख्वाब के जरिए अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का हुक्म दिया था। हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को सबसे प्यारे उनके बेटे हजरत ईस्माइल थे। हजरत इब्राहिम ने ये किस्सा अपने बेटे हजरत ईस्माइल को बताया कि अल्लाह ने उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया है और उनके लिए सबसे प्यारे और अजीज उनके बेटे ही हैं। हजरत इब्राहिम की ये बात सुनकर हजरत ईस्माइल ने अल्लाह के हुक्म का पालन करने का आदेश दिया और अपने वालिद (पिता) के हाथों क़ुर्बानी होने के लिए राजी हो गये और उस समय हजरत ईस्माइल की उम्र करीब 13-14 साल की थी।

ऐसा माना जाता है कि हजरत इब्राहिम को 80 साल की उम्र में औलाद नसीब हुई थी। हजरत इब्राहिम के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देना एक बड़ा इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ अल्लाह का हुक्म था तो दूसरी तरफ बेटे की मुहब्बत, लेकिन हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत ईस्माइल ने अल्लाह के हुक्म को माना। बेटे को कुर्बान करना हजरत इब्राहिम के लिए आसान नहीं था। बेटे को कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं कहीं आड़े ना आ जाए, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधी और बेटे पर छुरा चलाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन उसके वावजूद जैसे ही उन्होंने बेटे पर छुरा चलाया तो अल्लाह ने उनके बेटे की जगह दुंबा (एक जानवर) भेज दिया और हजरत ईस्माइल की जगह दुंबा कुर्बान हो गया। तभी से हर हैसियतमंद मुस्लमान पर कुर्बानी वाजिब हो गई।