परिचय

पुरुषोत्तम दास टंडन एक जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी, राजनयिक (Diplomat), पत्रकार, और समाज सुधारक थे। वे एक सादा जीवन जीते थे, इस वजह से लोग उन्हें ‘राजर्षि’ उपनाम से भी जानते थे। हिंदी भाषा को देश की राजभाषा बनाने में पुरुषोत्तम दास टंडन का काफी बड़ा योगदान है।

सन् 1910 में ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, वाराणसी में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ की स्थापना भी पुरुषोत्तम दास टंडन ने ही की थी। स्वाधीनता आन्दोलन के चलते उन्हें कई बार जेल में डाल दिया गया था। वे कुल 13 वर्षों तक ‘यूनाइटेड प्रोविंस’ (वर्तमान उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) विधान सभा के अध्यक्ष के पद पर नियुक्त रहे। पुरुषोत्तम दास टंडन ने कृषक आंदोलनों में भी हिस्सा लिया था। भारत की आजादी के बाद उन्हें लोक सभा और राज्य सभा के लिए भी चुना गया था। सन् 1961 में पुरुषोत्तम दास टंडन  को भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था।

शुरूआती जीवन

1 अगस्त, 1882 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में जन्में पुरुषोत्तम दास टंडन की शुरूआती शिक्षा इलाहाबाद में स्थित ‘सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर स्कूल’ से हुई। सन् 1894 में उनकी बड़ी बहन ‘तुलसा देवी’ का देहांत हो गया। सन् 1897 में हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद उनकी शादी मुरादाबाद में रहने वाले नरोत्तमदास खन्ना की बेटी ‘चन्द्रमुखी देवी’ से करा दी गई।

सन् 1899 में पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस पार्टी से जुड़े और सन् 1899 में ही उन्होंने इण्टरमीडिएट की परीक्षा पास की। सन् 1900 में उनकी और उनकी पत्नी की एक बेटी हुई। इसी बीच पुरुषोत्तम दास टंडन स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ‘म्योर सेण्ट्रल कॉलेज’ में दाखिला लिया, मगर उनकी क्रांतिकारी हरकतों के कारण उन्हें सन् 1901 में कॉलेज से निकाल दिया था।

सन् 1903 में पुरुषोत्तम दास टंडन के पिता के देहांत के बाद कई कठिनाइयों को सहते हुए सन् 1904 में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। सन् 1905 में उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। सन् 1906 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। इसी बीच उनका लेखन शुरू हुआ और कई पत्र-पत्रिकाओं में उनका लेखन छपा। इन सब के बीच भी उन्होंने अपनी पढाई नहीं छोड़ी। सन् 1906 में उनकी एल. एल. बी (LLB) पूरी हो गई और उन्होंने वकालत शुरू कर दी। सन् 1907 में उन्होंने इतिहास में स्नात्कोत्तर की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय बाद वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में उस समय के जाने-माने वकील ‘तेज बहादुर सप्रू’ के जूनियर बने।

कार्यक्षेत्र

पुरुषोत्तम दास टंडन बहुत होशियार होने के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा से भरे हुए थे। पुरुषोत्तम दास टंडन का कार्यक्षेत्र तीन हिस्सों में बँटा हुआ है- साहित्य, स्वतंत्रता संग्राम और समाज।

देश के बंटवारे पर विचार

12 जून 1947 को कांग्रेस की कार्य समिति ने देश के बंटवारे को स्वीकार कर लिया। 14 जून को इस प्रस्ताव को ‘अखिल भारतीय कांग्रेस समिति’ के सामने रखा गया, तब कई लोगों ने इसका विरोध किया, जिनमें से एक पुरुषोत्तम दास टंडन भी थे। पुरुषोत्तम दास टंडन का मानना था कि बंटवारा करने का अर्थ होगा अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के सामने हार मानना। उन्होंने कहा कि बंटवारे से किसी का फायदा नहीं हो सकता, पाकिस्तान में हिन्दू और हिंदुस्तान में मुस्लिम लोग डर में अपना जीवन बिताने पर मजबूर हो जाएँगे।

हिंदी भाषा के लिए कार्य

हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने में पुरुषोत्तम दास टंडन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ‘हिंदी प्रचार सभाओं’ के जरिए पुरुषोत्तम दास टंडन ने भारत में हिंदी को बाकी भाषाओं से आगे रखा। गाँधी जी और दूसरे कई नेता ‘हिन्दुस्तानी’ (उर्दू और हिंदी का मेल) भाषा को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे, पर पुरुषोत्तम दास टंडन ने ‘देवनागरी लिपि’ के प्रयोग पर जोर दिया और हिंदी में ‘उर्दू लिपि’ के शब्दों के इस्तेमाल करने का विरोध किया।

मृत्यु

1 जुलाई 1962 में 80 वर्ष की आयु में पुरुषोत्तम दास टंडन का निधन हो गया।