परिचय

गणेश शंकर विद्यार्थी भारत के एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार, समाज-सेवी और स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में उनका नाम ‘सुनहरे’ अक्षरों में लिखा गया है। गणेश शंकर विद्यार्थी उन पत्रकारों में से एक थे, जिन्होंने अपने लेखन से भारत में अंग्रेज़ी शासन की नींद उड़ा दी थी। इन्होंने केवल अपनी ‘कलम और वाणी’ से ही नहीं, बल्कि और भी कई तरीकों से भारत को आजाद कराने में मदद की। गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन काल छोटा था और इन्होंने उसे उत्पीड़न और क्रूर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने में लगाया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने हमेशा उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई थी।

शुरूआती जीवन

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 इलाहाबाद के ‘अतरसुइया’ मोहल्ले में हुआ था। वे एक कायस्थ परिवार से थे। उनके पिता ‘जय नारायण’, हथगाँव के रहने वाले थे। गणेश शंकर विद्यार्थी के पिता ग्वालियर में मुंगावली के एक स्कूल में हेडमास्टर का कार्य करते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का बचपन ग्वालियर में ही बीता और साथ ही शुरूआती शिक्षा भी वहीं हुई।

गणेश शंकर विद्यार्थी ने सन् 1907 में एक प्राइवेट परीक्षार्थी के तौर पर हाई स्कूल की परीक्षा पास की। गरीबी की वजह से वे उसके आगे पढ़ नहीं सके और करेंसी आफिस में एक क्लर्क का काम करना शुरू कर दिया और उसके बाद वे कानपूर में एक हाई स्कूल टीचर बन गये। 16 साल की उम्र में गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी पहली किताब लिखी। 4 जून, 1909 को गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘चंद्रप्रकाशवती’ से शादी कर ली।

लेखन का कार्य

सन् 1911 में गणेश शंकर विद्यार्थी ‘सरस्वती पत्रिका’ में पं॰ ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी’ के सहायक के तौर पर काम करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने ‘सरस्वती पत्रिका’ से नौकरी छोड़ दी और ‘अभ्युदय’ नाम की राजनीतिक पत्रिका में सहायक के तौर पर कार्य करने लगे। उन्होंने अभ्युदय (राजनीतिक पत्रिका) में सितंबर, 1913 तक काम किया। 2 महीने बाद 9 नवम्बर 1913 को कानपुर में खुद का साप्ताहिक अखबार ‘प्रताप’ के नाम से निकाला। इसके बाद से गणेश शंकर विद्यार्थी के राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक (Adult literary) जीवन की शुरुआत हुई।

पहले गणेश शंकर विद्यार्थी ने बाल गंगाधर तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, मगर राजनीति में गाँधी जी के आने के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी उनके बड़े भक्त बन गये। एनीं बेसेंट के ‘होमरूल’ आंदोलन’ में गणेश शंकर विद्यार्थी ने बहुत अच्छी तरह और मेहनत से काम किया। कांग्रेस के अलग-अलग आंदोलनों में हिस्सा लेने और अधिकारियों के अत्याचारों के खिलाफ बिना ड़रे गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ (साप्ताहिक अखबार) में लेख लिखे, जिसकी वजह से इन्हें 5 बार जेल में डाला गया था। कुछ ही सालों में वे कांग्रेस के ‘संयुक्त प्रांत’ (उत्तर प्रदेश) के जाने-माने नेता बन गये।

प्रताप (साप्ताहिक अखबार) छापना शुरू करने के 7 साल बाद सन् 1920 में गणेश शंकर विद्यार्थी ने उसे साप्ताहिक से ‘दैनिक’ में बदल दिया और साथ ही उन्होंने ‘प्रभा’ नाम से एक नई साहित्यिक और राजनीति से जुडी पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। प्रताप अखबार में किसानों और मजदूरों की सहायता के लिए पत्र छापते थे। प्रताप अखबार में भारत की प्रजा के कष्टों के बारे में लिखा जाता था।

मृत्यु

25 मार्च 1931 को कानपुर के सांप्रदायिक दंगों में गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई। हत्या के समय उनकी आयु 41 वर्ष थी।