चम्पक रमन पिल्लई की जीवनी | Chempaka Raman Pillai Biography in Hindi

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चम्पक रमन पिल्लई एक भारतीय राजनैतिक कार्यकर्ता और क्रांतिकारी थे। उनका जन्म भारत में हुआ था, मगर उसके बावजूद उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन जर्मनी में बिताया। चम्पक रमन पिल्लई का नाम उन क्रांतिकारियों के साथ लिया जाता है, जिन्होंने भारत को आजादी दिलाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। वे एक ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारत से बाहर रहकर भारत की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया और एक विदेशी ताकत के साथ मिलकर भारत में अंग्रेजी हुकुमत का सफाया करने के प्रयत्न किए। यह हमारी बदकिस्मती है कि आज उन्हें बहुत कम लोग ही जानते हैं, मगर यह देश हमेशा उनकी कुर्बानी का साक्षी रहेगा।

शुरूआती जीवन

चम्पक रमन पिल्लई का जन्म 15 सितम्बर 1891 को त्रावनकोर राज्य के तिरुवनंतपुरम जिले में हुआ था। चम्पक रमन पिल्लई एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से थे। चम्पक रमन पिल्लई के माता-पिता का नाम ‘नागम्मल’  और ‘चिन्नास्वामी पिल्लई’ था। चम्पक रमन पिल्लई के पिता वैसे तो तमिल थे, मगर त्रावनकोर राज्य के पुलिस कांस्टेबल होने की वजह से तिरुवनंतपुरम में ही बस गये थे।

थैकौड़ (तिरुवनंतपुरम) के मॉडल स्कूल से चम्पक रमन पिल्लई ने अपनी शुरूआती शिक्षा प्राप्त की और अपनी हाई स्कूल की शिक्षा भी उन्होंने वहीं से प्राप्त की। चम्पक रमन पिल्लई के स्कूली जीवन में उनकी मुलाकात ब्रिटिश के जीव वैज्ञानिक ‘सर वाल्टर स्ट्रिकलैंड’ से हुई। सर वाल्टर स्ट्रिकलैंड कई बार वनस्पतिओं के नमूने लेने के लिए तिरुवनंतपुरम आया करते थे। ऐसे ही एक बार जब वे तिरुवनंतपुरम गये, तब उन्होंने चम्पक रमन पिल्लई और उसके चचेरे भाई पद्मनाभा पिल्लई को अपने साथ आने को कहा और वे दोनों उनके साथ चले गये।

पद्मनाभा पिल्लई केवल कोलम्बो तक ही गये और फिर वापस आ गये, मगर चम्पक रमन पिल्लई सर वाल्टर स्ट्रिकलैंड के साथ यूरोप पहुँच गये। सर वाल्टर स्ट्रिकलैंड की मदद से चम्पक रमन पिल्लई का दाखिला ऑस्ट्रिया के एक स्कूल में हो गया, जहाँ से उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की।

यूरोप में जीवन

स्कूल की पढाई पूरी करके चम्पक रमन पिल्लई ने एक तकनीकी संस्थान में दाखिला लिया, ताकि वे इंजीनियरिंग की पढाई कर सके। पहले विश्व युद्ध के चलते चम्पक रमन पिल्लई ने ‘इंटरनेशनल प्रो इंडिया कमेटी’ की स्थापना की थी। इंटरनेशनल प्रो इंडिया कमेटी का मुख्यालय ज्यूरिख में रखा गया। इसी समय के आस-पास जर्मनी के बर्लिन शहर कुछ प्रवासी भारतीयों ने साथ में ‘इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी’ नामक एक संस्था को स्थापित किया। इस दल में वीरेन्द्रनाथ चटोपाध्याय, भूपेन्द्रनाथ दत्त, ए. रमन पिल्लई, तारक नाथ दास, मौलवी बरकतुल्लाह, चंद्रकांत चक्रवर्ती, एम. प्रभाकर, बिरेन्द्र सरकार और हेरम्बा लाल गुप्ता भी थे।

अक्टूबर 1914 को चम्पक रमन पिल्लई बर्लिन गये और वहाँ जाकर वे बर्लिन कमेटी से जुड़ गये और फिर उन्होंने बर्लिन कमेटी को इंटरनेशनल प्रो इंडिया कमेटी के साथ जोड़ दिया। यह कमेटी यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता से जुड़े हुई सभी क्रांतिकारी गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए बनाई गई थी। लाला हरदयाल भी इस आन्दोलन में शामिल हो गये। कुछ ही समय में इसकी शाखाएं अम्स्टरडैम, स्टॉकहोम, वाशिंगटन, यूरोप और अमेरिका के दूसरे शहरों में भी फैल गई।

ग़दर पार्टी और इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी दोनों ही तथाकथित ‘हिन्दू-जर्मन साजिश’ में शामिल थी। जर्मनी ने कमेटी की बहुत मदद की ताकि कमेटी ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों को जारी रख सके। ए. रमन पिल्लई और चम्पक रमन पिल्लई ने साथ मिलकर कमेटी में काम किया। बाद में चम्पक रमन पिल्लई और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मुलाकात भी हुई। ऐसा कहा जाता है कि ‘जय हिन्द’ नारे की शुरुआत चम्पक रमन पिल्लई ने ही की थी।

पहले विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की हार होने के बावजूद भी चम्पक रमन पिल्लई जर्मनी में ही रहे। चम्पक रमन पिल्लई ने बर्लिन में रहते हुए एक फैक्ट्री में एक तकनीशियन की नौकरी करना शुरू कर दिया।

विदेश मंत्री पद

1 दिसम्बर 1915 को मोहम्मद बरकतुल्लाह और राजा महेंद्र प्रताप ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की एक अस्थायी सरकार की स्थापना की थी। इसमें राष्ट्रपति के पद को महेंद्र प्रताप ने प्रधानमंत्री पद को बरकतुल्लाह ने ग्रहण किया। इस सरकार में चम्पक रमन पिल्लई को विदेश मंत्री का पद दिया गया। मगर पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद अंग्रेजों ने इन क्रांतिकारियों को अफगानिस्तान से बाहर कर दिया था।

शादी

चम्पक रमन पिल्लई बर्लिन में एक लड़की से मिले जिनका नाम लक्ष्मीबाई था। लक्ष्मीबाई मणिपुर की रहने वाली थी। सन् 1931 में चम्पक रमन पिल्लई और लक्ष्मीबाई की शादी हुई। शादी के बाद चम्पक रमन पिल्लई बीमार हो गये और अपना इलाज करने के लिए इटली चले गये। ऐसा कहा जाता है के उन्हें जहर दिया गया था।

मृत्यु

चम्पक रमन पिल्लई बीमारी से ठीक नहीं हो पाए और 28 मई 1934 को बर्लिन में उनका देहांत हो गया। चम्पक रमन पिल्लई की पत्नी उनके देहांत के बाद उनकी अस्थियों को भारत ले आई और उसके बाद उनकी अस्थियों  को कन्याकुमारी में प्रवाहित किया गया।