परिचय

सी. एन. अन्नादुराई का पूरा नाम ‘कान्जीवरम नटराजन अन्नादुराई’ था, वे एक भारतीय राजनेता और तमिल नाडु राज्य के मुख्यमंत्री थे। वे तमिल नाडु के प्रसिद्ध नेता, प्रथम गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री और ‘द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम’ दल के संस्थापक थे। उनका तमिल नाडु की राजनीति में बहुत प्रभाव था, राज्य की जनता उन्हें ‘अन्ना’ एवं ‘बड़ा भाई’ कहकर पुकारती थी। वे तमिल भाषा के सम्मानित लेखक थे। उन्होंने कई नाटक लिखे और उनमें अभिनय भी किया एवं कुछ नाटकों पर बाद में फिल्में भी बनी। वे द्रविड़ पार्टियों में से पहले नेता थे, जिन्होंने तमिल फिल्मों के द्वारा अपना राजनीतिक प्रसार किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की और बाद में तमिल नाडु राज्य के मुख्यमंत्री बने।

सी. एन. अन्नादुराई का जन्म तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम शहर में 15 सितम्बर 1909 को एक सामान्य परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘नटराज मुदलिआर’ था तथा उनकी माता का नाम ‘बांगरमल’ था, उनके पिता एक बुनकर थे और उनकी माता मंदिर की सेविका थीं। सी. एन. अन्नादुराई का पालन-पोषण उनकी बहन ‘राजमणि अम्मल’ ने किया। उन्होंने पचैयाप्पा हाई स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़कर परिवार की आर्थिक सहायता के लिए शहर के नगरपालिका कार्यालय में क्लर्क की नौकरी करने लगे। उन्होंने 21 वर्ष की उम्र में ‘रानी’ नाम की स्त्री से शादी कर ली। इस दंपत्ति की अपनी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने बाद में राजमणि के पोते को गोद लिया और उनका पालन-पोषण किया।

सी. एन. अन्नादुराई ने सन 1934 में चेन्नई के पचैयाप्पा कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद इसी कॉलेज से अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने पचैयाप्पा हाई स्कूल में अंग्रेजी अध्यापन का कार्य किया। बाद में उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और पत्रकारिता और राजनीति की ओर मुड़ गए। राजनीति में रूचि के कारण वे सन 1935 में जस्टिस पार्टी में शामिल हो गए।

जस्टिस पार्टी की स्थापना सन 1917 में गैर-ब्राह्मण संभ्रांतों द्वारा हुई थी। जस्टिस पार्टी का प्रारंभ ‘मद्रास यूनाइटेड लीग’ के तौर पर हुआ, जिसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मण विद्यार्थियों को मद्रास में आवास सम्बंधित सहायता करना था। धीरे-धीरे सी.एन. मुदलिआर, सर पी. टी. चेट्टी और डॉ टी. एम. नायर के मेहनत से यह संगठन एक राजनीतिक पार्टी बनी।

जस्टिस पार्टी सन 1920 से लेकर सन 1937 तक  मद्रास प्रेसीडेंसी में सत्ता में रही। जब सी. एन. अन्नादुराई पार्टी में शामिल हुए, तब ई. वी. रामासामी इसके अध्यक्ष थे। सी. एन. अन्नादुराई ने जस्टिस पत्रिका के सह-संपादक के तौर पर कार्य किया। बाद में वे विदुथलाई पत्रिका के संपादक बन गए और आगे जाकर तमिल साप्ताहिकी ‘कुडी अरासु’ से भी जुड़े। उन्होंने अपना पत्र ‘द्रविड़ नाडु’ भी प्रारंभ किया। सन 1944 में ई. वी. रामासामी ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कड़गम’ कर दिया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जो देश की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार से लड़ रही थी, में मुख्यतः ब्राह्मणों का वर्चस्व था। ई. वी. रामासामी का मानना था कि आजादी के बाद दक्षिण भारत ब्राह्मणों और उत्तर भारतीयों के प्रभुत्व में आ जायेगा इसलिए उन्होंने 15 अगस्त 1947 को शोक दिवस के रूप में मनाया। सी. एन. अन्नादुराई ने ई. वी. रामासामी के इस सोच का विरोध किया, जिससे उनके बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे। सी. ए. अन्नादुराई ने ई. वी. रामासामी के लोकतान्त्रिक चुनाव में भाग न लेने के फैसले का भी विरोध किया। इन सब के बीच जब ई. वी. रामासामी ने अपने से 40 साल छोटी ‘मनिअम्मै’ से विवाह कर लिया, तो दोनों के बीच की खायी और गहरी हो गयी। इसके बाद उन्होंने ई. वी. रामासामी से नाता तोड़ एक नई राजनैतिक पार्टी ‘द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम’ की स्थापना की।

द्रविड़ कड़गम के दिनों से ही सी. एन. अन्नादुराई एक पृथक राष्ट्र ‘द्रविड़ नाडु’ के मांग का समर्थन कर रहे थे। अपनी नई पार्टी में भी उन्होंने इस बात पर जोर दिया और ‘द्रविड़ नाडु’ की मांग रखी, पर पहले भाषा के आधार पर मद्रास प्रेसीडेंसी के क्षेत्रों का नए राज्यों में विभाजन और बाद में भारत-चीन युद्ध के पश्चात भारतीय संविधान में परिवर्तन ने इस मांग को निरर्थक बना दिया। इस संवैधानिक परिवर्तन के बाद डी.एम.के. (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) और सी. एन. अन्नादुराई ने पृथक द्रविड़ राष्ट्र की मांग को ठन्डे बिस्तर में डाल दिया।

दक्षिण भारतीय राजनेता हिंदी का विरोध राष्ट्र भाषा के रूप में सदैव ही करते आये थे। आजादी से पहले भी जब-जब हिंदी को अनिवार्य भाषा के तौर पर पढ़ाने की बात हुई, तब-तब राजनेताओं और लोगों ने इसका विरोध किया। सन 1950 में देश का संविधान लागू हुआ था और ये फैसला लिया गया कि 15 साल बाद सन 1965 में हिंदी को ‘राष्ट्र भाषा’ का स्थान दिया जायेगा। इस बात ने दक्षिण के राज्यों और ख़ास तौर पर तमिल नाडु में आम व्यक्तियों और छात्रों की व्यघ्रता बढ़ा दी। सी. एन. अन्नादुराई ने भी इसका पुरजोर विरोध किया और समूचे मद्रास प्रेसीडेंसी और दक्षिण के कुछ अन्य भागों में हिंदी विरोधी आन्दोलन को उग्र कर दिया। उनकी पार्टी ने 24 जनवरी 1965 को शोक दिवस मनाया और विरोध-प्रदर्शन किया। इस आन्दोलन ने धीरे-धीरे उग्र रूप धारण कर लिया और हिंसा बढ़ गयी। बढ़ती हिंसा को देख सी. एन. अन्नादुराई ने लोगों से आन्दोलन समाप्त करने की अपील की पर ‘करूणानिधि’ जैसे कुछ नेताओं ने इसे जारी रखा, जिसका पूरा फायदा डी.एम.के. को सन 1967 के चुनाव में मिला।

सन 1967 के चुनाव में डी.एम.के. को भारी जीत हासिल हुई और सी. एन. अन्नादुराई मुख्यमंत्री नियुक्त किए गए। इस प्रकार वे भारत के प्रथम गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। उन्होंने अपने नेतृत्व में राज्य का नाम बदलकर ‘तमिल नाडु’ कर दिया। सी. एन. अन्नादुराई कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। मृत्यु से पहले उनका इलाज अमेरिका में चल रहा था, लेकिन यह इलाज़ सफल नहीं हो सका और 3 फरवरी 1969 को उनकी मृत्यु चेन्नई में हुई।

जीवन घटनाचक्र

  • सी. एन. अन्नादुराई का जन्म 15 सितम्बर 1909 को तमिलनाडु के कांचीपुरम में हुआ।
  • उनका विवाह सन 1930 में ‘रानी’ नाम की स्त्री के साथ हुआ।
  • उन्होंने सन 1934 में चेन्नई के पचैयाप्पा कॉलेज से स्नातक किया।
  • वे सन 1935 में जस्टिस पार्टी में शामिल हो गए।
  • सन 1938 में कांचीपुरम में हुए पहले हिंदी विरोधी सम्मलेन में भाग लिया।
  • सन 1944 में जस्टिस पार्टी का नाम ‘द्रविड़ कड़गम’ हो गया।
  • उन्होंने सन 1948 में अपनी पहली फिल्म ‘नाल्लाथाम्बी’ बनायी।
  • सन 1949 में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डी.एम.के) की स्थापना की।
  • सन 1962 में राज्य सभा के लिए नियुक्त किए।
  • सन 1965 में हिंदी को आधिकारिक भाषा के मुद्दे पर विरोध किया।
  • सन 1967 में मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री नियुक्त किए गए।
  • सन 1969 में मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम बदलकर ‘तमिल नाडु’ कर दिया गया।
  • उनका निधन 3 फरवरी 1969 को चेन्नई में हुआ।