लूनी नदी भारत की एकमात्र अंतर्वाही नदी है (जो नदी देश के बीच में स्थित किसी पहाड़ या पर्वत से निकलकर देश के भीतर किसी सागर या जलाशय में जाकर गिरती है, उसे अंतर्वाही नदी कहते हैं) यह नदी अरावली पर्वत के निकट आनासागर से उत्पन्न होकर दक्षिण पश्चिम क्षेत्र में प्रवाहित होते हुए कच्छ के रन में जाकर मिलती है।

लूनी नदी का नाम संस्कृत शब्द लवणगिरि (नमकीन नदी) से लिया गया है और अत्यधिक लवणता के कारण इसका यह नाम पड़ा है। इसको प्राचीनकाल में ‘लवणवती’ के नाम से जाना जाता था। लूनी नदी का उद्गम पश्चिमोत्तर भारत के राजस्थान राज्य के अजमेर शहर के निकट अरावली श्रेणी की नाग पगड़ी के पश्चिमी ढलानों में उद्गम जहाँ इसे सागरमती के नाम से जाना जाता है।

कुछ किताबों के अनुसार सागरमति और सरस्वती की दो धाराओं के उद्गम से इस नदी का निर्माण हुआ है। इसके उद्गम स्थल पर सागरमती तथा पुष्कर की पहाड़ियों में इसे शाकरी कहा जाता है। कालिदास ने इस नदी को अन्तस्य लीला की संज्ञा भी दी है।

पश्चिमी ढलानों से यह आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर पहाड़ियों से होती हुयी इस प्रदेश के मैदानों के पार बहती है। फिर यह रेगिस्तान के एक भाग से होकर अंततः गुजरात राज्य के कच्छ के रण के पश्चिमोत्तर भाग की बंजर जमीन में छुप जाती है। लूनी नदी एक मौसमी नदी है और इसका अपवाह मुख्यतः अरावली श्रेणी की दक्षिण-पश्चिमी ढलानों से होता है। जोवाई, सुकरी और जोजारी इसकी प्रमुख सहायक नदियां है।

495 किलोमीटर लंबी धारा वाली लूनी इस क्षेत्र की एकमात्र प्रमुख नदी है और यह सिंचाई का एक अनिवार्य स्रोत है। राजस्थान में लूनी नदी की कुल लम्बाई 330 किलोमीटर है और राजस्थान में लूनी का प्रवाह गौड़वाड़ क्षेत्र को गौड़वाड़ प्रदेश भी कहा जाता है। इसकी सहायक नदियां बंकडा, सूकली, मीठडी, सागी, लीलडी पूर्व दिशा की ओर से, लेकिन जोजड़ी नदी एकमात्र ऐसी नदी जो पश्चिम दिशा की ओर से जुडती है।

लूनी नदी का उद्गम नागौर जिले के पॉडलू नामक गाँव से होता है और ये जोधपुर के खेजडली नामक गाँव में आकर लोनी नदी में  मिलती है। यह नदी बालोतरा (बाड़मेर) के पश्चात खारी ही जाती है, क्योंकि रेगिस्तान क्षेत्र में गुजरने पर रेत में सम्मिलित नमक के कण पानी में विलीन ही जाते हैं, इसी कारण लूनी नदी का पानी खारा हो जाता है।