मकर संक्रान्ति का त्यौहार हिन्दू धर्म के मुख्य त्योहारों में से एक है, जो सूर्य के उत्तरायन होने पर मनाया जाता है। इस पर्व की विशेषता यह है कि यह दूसरे त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं मनाया जाता, बल्कि हर साल 14 जनवरी को ही मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति का त्यौहार कभी-कभी 13 या 15 जनवरी को भी मनाया जाता है। जब सूर्य ‘मकर रेखा’ को काटते हुए उत्तर दिशा की और बढ़ता है। मकर संक्रान्ति वर्ष में 12 बार हर राशि में आती है, लेकिन मकर और कर्क राशि में इसके प्रवेश पर अधिक महत्व है। जिसके साथ बढती गति के चलते मकर में सूर्य के प्रवेश से दिन बड़ा, तो रात छोटी हो जाती हैं, जबकि कर्क में सूर्य के प्रवेश से रात बड़ी और दिन छोटा हो जाता है।

मकर संक्रान्ति | Makar Sankranti in Hindi

मकर संक्रान्ति की कथा

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस विशेष दिन पर भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि के पास जाते हैं, उस समय शनि मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। पिता और पुत्र के बीच स्वस्थ सम्बन्धों को मनाने के लिए मतभेदों के आलावा,मकर संक्रान्ति को महत्व दिया गया। ऐसा माना जाता है कि इस विशेष दिन पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते हैं, तो उनके संघर्ष हल हो जाते हैं और सकारात्मक खुशी और समृधि के साथ साझा हो जाता हैं ।

इसके आलावा इस विशेष दिन की एक कथा और है, जो भीष्म पितामह से जुडी हुई है, जिन्हें यह वरदान मिला था कि उन्हें अपनी इच्छा से मृत्यु प्राप्त होगी, जब वे बाणों की सज्जा पर लेटे हुए थे। तब वे उत्तरायण के दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे और उन्होंने इस दिन अपनी आँखें बंद की और इस तरह उन्हें इस विशेष दिन पर मोक्ष की प्राप्ति हुई।

मकर संक्रान्ति का महत्व

किसानों के लिए मकर संक्राति का त्यौहार बहुत अधिक महत्वपूर्ण होता है, इस दिन सभी किसान अपनी फसल काटते हैं। मकर संक्रान्ति भारत का सिर्फ एक ऐसा त्यौहार है, जो प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को ही मनाया जाता है। 14 जनवरी के दिन सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है। हिन्दुओं के लिए सूर्य एक रोशनी, ताकत और ज्ञान का प्रतीक होता है। मकर संक्रान्ति का त्यौहार सभी को अंधकार से प्रकाश की ओर बढने की प्रेरणा देता है। मकर संक्रान्ति के दिन, सूर्योदय से सूर्यास्त तक पर्यावरण अधिक चैतन्य रहता है, यानि पर्यावरण में दिव्य जागरूकता होती है। इसीलिए इस दिन लोग आध्यात्मिक अभ्यास करते हैं।

मकर संक्रान्ति की पूजा विधि

  • पूजा शुरू करने से पहले पूण्य काल मुहूर्त और महा पुण्य काल मुहूर्त निकालते हैं और पूजा करने की जगह को साफ़ और शुद्ध कर लेते हैं। यह पूजा भगवान सूर्य के लिए की जाती है।
  • पूजा की थाली में 4 काले और 4 सफेद तिल के लड्डू रखे जाते हैं और कुछ पैसे भी थाली में रखते हैं।
  • इसके बाद पूजा की थाली में चावल का आटा और हल्दी का मिश्रण, सुपारी, पान के पत्ते, शुद्ध जाल, फूल और अगरबत्ती रखी जाती हैं।
  • भगवान के प्रसाद के लिए थाली में काले और सफ़ेद तिल के लड्डू, पैसे, मिठाई रखकर भगवान का भोग लगाया जाता है।
  • भगवान सूर्य को प्रसाद (भोग) लगाने के बाद उनकी आरती की जाती है।
  • पूजा के समय महिलाएं अपने सिर को कपड़े से ढक कर रखती हैं।
  • सूर्य मंत्र “ॐ’ हर ही हैं सह सूर्याय नम:” मंत्र का 21 या 108 बार जप किया जाता है।

भगवान सूर्य के भक्त मकर संक्रान्ति के दिन 12 मुखी रुद्राक्ष भी पहनते हैं या पहनना शुरू करते हैं। इसी दिन रूबी,जेमस्टोन भी पहना जाता है।