परिचय

‘भारत रत्न’ से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ मशहूर शहनाई वादक थे। सन 1969 में ‘एशियाई संगीत सम्मेलन’ के ‘रोस्टम पुरस्कार’ तथा अनेक अन्य पुरस्कारों से सम्मानित बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई को भारत के बाहर एक विशिष्ट पहचान दिलवाई।

जीवन परिचय

बिस्मिल्लाह ख़ाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को बिहार के डुमरांव नामक स्थान पर हुआ था। वे विश्व के सबसे अच्छे शहनाई वादक माने जाते थे। उनके परदादा शहनाई नवाज़ उस्ताद सालार हुसैन ख़ाँ से शुरू यह परिवार पिछली पाँच पीढ़ियों से शहनाई वादन करता आ रहा है। बिस्मिल्लाह ख़ाँ को उनके चाचा अली बक्श ‘विलायतु’ ने संगीत की शिक्षा दी।

शिक्षा

बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक किस्सा भी जुड़ा हुआ है। उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए ‘बिस्मिल्ला’ कहा। इसके बाद उनका नाम ‘बिस्मिल्ला’ रख दिया गया। उनके पूर्वज बिहार के भोजपुर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार थे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्ला ख़ाँ को बनारस ले जाया गया, जहां वे अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई वादन सीखने लगे।

जटिल संगीत रचना

बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने जटिल संगीत की रचना, जिसे तब तक शहनाई के विस्तार से बाहर माना जाता था, में परिवर्द्धन करके अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और शीघ्र ही उन्हें इस वाद्य से ऐसे जोड़ा जाने लगा, जैसा किसी अन्य वादक के साथ नहीं हुआ। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली में लाल क़िले से अत्यधिक मर्मस्पर्शी शहनाई वादक प्रस्तुत किया।

विदेशों में वादन

बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने अफ़ग़ानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ़्रीका, अमेरिका, भूतपूर्व सोवियत संघ, जापान, हांगकांग और विश्व भर की लगभग सभी राजधानियों में शहनाई का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जाति से शिया होने के बावज़ूद वे विद्या की हिन्दू देवी सरस्वती के परम भक्त थे। उनको ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ और ‘शांतिनिकेतन’ ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि देकर सम्मानित किया था। आज भी लोगों के कानों में उनकी शहनाई की गूँज गूँजती है।

शहनाई ही बेगम

मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्ला ख़ाँ शहनाई को अपनी बेगम कहते थे। पत्नी के निधन के बाद शहनाई ही उनकी बेगम और संगी-साथी दोनों थी।

जुगलबंदी

मंदिरों, राजे-रजवाड़ों के मुख्य द्वारों और शादी-ब्याह के अवसर पर बजने वाले शहनाई को बिस्मिल्ला ख़ाँ ने अपने मामू उस्ताद मरहूम ‘अलीबख़्श’ के निर्देश पर ‘शास्त्रीय संगीत’ का वाद्य बनाने में जो अथक मेहनत की, उसकी दूसरी मिसाल कहीं भी नहीं मिलती। उस्ताद विलायत ख़ाँ के सितार और पण्डित वी. जी. जोग के वायलिन के साथ उनकी शहनाई जुगलबंदी के एल. पी. रिकॉडर्स ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। जुगलबंदियों का दौर इन्हीं एलबम्स के बाद चला।

स्वतंत्रता दिवस पर शहनाई वादन

बिस्मिल्ला ख़ाँ और भारत की आजादी की शहनाई का भी अनूठा रिश्ता रहा है। 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहरा रहा था, तब उनकी शहनाई भी वहां आजादी का संदेश दे रही थी। तब से लगभग हर वर्ष 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद उनकी शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी। उन्होंने अपने जीवन काल में ईरान, इराक, अफ़ग़ानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस जैसे अलग-अलग देशों में अपनी शहनाई की धुनें बिखेरीं।

सम्मान एवं पुरस्कार

  • बिस्मिल्लाह ख़ाँ को सन 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें सन 1961 में ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें सन 1968 में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें सन 1980 में ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें 2001 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ‘तानसेन पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया।

निधन

एक समय ऐसा आया, जब बिस्मिल्ला ख़ान आर्थिक रूप से मुश्किल में आ गए थे, तब सरकार को उनकी मदद के लिए आगे आना पड़ा था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई और 21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।