परिचय

दादाभाई नौरोजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने वाले व्यक्तियों में से एक थे। उन्हें भारत का ‘वयोवृद्ध पुरुष’ (Grand Old Man of India) कहा जाता था। वे अंग्रेजों के शासन काल में भारत के एक पारसी बुद्धिमान, शिक्षाशास्त्री, रुई (सूती कपडा) के करोवारी तथा शुरुआती राजनैतिक एवं समाज सेवी नेता थे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में अहम भूमिका निभाई और 3 बार अध्यक्ष भी रहे। स्वराज की मांग उनके द्वारा सन 1906 में एक अध्यक्षीय भाषण में सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई।

शुरूआती जीवन

दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितम्बर 1825 को भारत के बम्बई शहर में एक गरीब पारसी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ‘नौरोजी पलांजी डोरडी’ तथा माता का नाम ‘मनेखबाई’ था। जब वे मात्र 4 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया और इनका पालन-पोषण इनकी माता द्वारा हुआ, जिन्होंने अनपढ़ होने के बावजूद भी यह तय किया कि दादाभाई नौरोजी को यथासंभव सबसे अच्छी अंग्रेजी शिक्षा मिले। एक छात्र के तौर पर दादा भाई नौरोजी गणित और अंग्रेजी में बहुत अच्छे थे। उन्होंने बम्बई के ‘एलफिंस्टन इंस्टिट्यूट से अपनी पढाई पूरी की, जहाँ वे मेधावी छात्र थे। दादा भाई नौरोजी ‘एलफिंस्टन इंस्टिट्यूट’ में गणित और भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय थे, उस समय वे केवल 27 वर्ष के थे।

राजनीतिक जीवन

सन 1852 में दादाभाई नौरोजी ने राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश किया और सन 1853 में ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ की लीज के नवीनीकरण का दृढ़ता पूर्वक विरोध किया। इस सम्बन्ध में उन्होंने ब्रिटिश सरकार को कई याचिकाएं भी भेजीं, परन्तु ब्रिटिश सरकार ने उनकी दलीलों को नजर अंदाज करते हुए लीज का नवीनीकरण कर दिया। दादाभाई नौरोजी ने यह महसूस किया कि लोगों की उदासीनता ही भारत पर ब्रिटिश कुशासन की वजह बनी। उन्होंने वयस्क युवकों की पढ़ाई के लिए ‘ज्ञान प्रसारक मंडली’ की स्थापना की। उन्होंने गवर्नर और वायसराय को भारत की समस्याओं के बारे में कई प्रार्थना पत्र लिखे। उन्होंने धीरे-धीरे महसूस किया कि ब्रिटेन के लोगों और संसद को भारत की दुर्दशा के बारे में अवगत कराया जाना चाहिए, इसलिए सन 1855 में 30 साल की उम्र में वह इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए।

इंग्लैंड में दादाभाई नौरोजी कई प्रबुद्ध संगठनों से मिले, कई भाषण दिए और भारत की दुर्दशा पर लेख लिखे। उन्होंने 1 दिसंबर 1866 को ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ की स्थापना की। इस संस्था में भारत के उन उच्च अधिकारियों को शामिल किया गया, जिनकी पहुंच ब्रिटिश संसद के सदस्यों तक थी। दादाभाई नौरोजी सन 1892 में सेंट्रल फिन्सबरी से लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ब्रिटिश संसद के लिए चुने गए। उन्होंने भारत और इंग्लैंड में एक साथ ICS (Indian Civil Services) की प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव पारित करवाया। उन्होंने भारत और इंग्लैंड के बीच प्रशासनिक और सैन्य खर्च के विवरण की सूचना देने के लिए ‘विले कमीशन’ और ‘रॉयल कमीशन’ भी पारित करवाया।

सन 1885 में दादाभाई नौरोजी ने ‘ए.ओ ह्यूम’ द्वारा स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। वे 3 बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष सन 1886, 1893 और 1906 में नियुक्त किए गए। उन्होंने अपने तीसरे कार्यकाल के समय पार्टी में नरमपंथी और गरमपंथियों के बीच हो रहे विभाजन को रोका। कांग्रेस की स्वराज (स्व-शासन) की मांग उनके द्वारा सन 1906 में एक अध्यक्षीय भाषण में सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई थी। दादाभाई नौरोजी के अनुसार ‘विरोध का स्वरुप अहिंसक और संवैधानिक होना चाहिए।’

देहांत

अचानक स्वास्थ्य खराब होने के कारण 92 साल की उम्र में भारत के मुंबई शहर में 30 जून 1917 को उनका देहान्त हो गया। वे भारत में राष्ट्रीय भावनाओं के जनक थे। उन्होंने देश में स्वराज की नींव डाली।