श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भगवान कृष्ण के जन्म महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार भारत में ही नही, बल्कि देश-विदेशों में भी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान कृष्ण का जन्म सावन माह की ‘कृष्ण पक्ष अष्टमी’ में आधी रात को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में हुआ था।

कृष्ण जन्माष्टमी | Krishna Janmashtami in Hindi

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मथुरा नगरी भक्तों के रंगों में रंगीन हो जाती है। कृष्ण जन्माष्टमी के पवित्र मौके पर भगवान कृष्ण की छवि देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से बड़ी संख्या में मथुरा पहुँचते हैं। जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को खास तरीके से सजाया जाता है, झांकियां सजाई जाती हैं, भगवान कृष्ण को झूले में झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन भी किया जाता है। इस दिन सभी पुरुष-महिलाएं रात्रि 12 बजे तक उपवास रखते हैं। ज्यादातर लोग रात को  ही मंदिरों में जाकर भगवान कृष्ण के दर्शन करने के बाद प्रसाद लेते हैं और उस प्रसाद को पाकर अपना व्रत खोलते हैं।

  • स्कन्द पुराणों के अनुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत नहीं रखता है, वह मनुष्य अगले जन्म में जंगल में सर्प और बाघ के रूप में जन्म लेता है।
  • ब्रह्मपुराण के अनुसार कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में 28 वें युग में देवकी के कोख में 8 वें पुत्र भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। यदि दिन या रात में कला मात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चन्द्रमा से मिली हुई रात में इस व्रत को करें।
  • भविष्य पुराण के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह राक्ष स होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही व्रत करने को कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो जयंती नाम से संबोधित की जाएगी।
  • वह्निपुरण का अनुसार कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो, तो उसको जयंती नाम से संबोधित किया जाएगा । अत: इस प्रकार से व्रत रखना चाहिए।

कृष्ण जन्माष्टमी की रात को प्रलय की रात भी कहा जाता है। इस रात में योगेश्वर कृष्ण का ध्यान, अथवा मंत्र जपते हुए जागने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है, इसके सविधि पालन करने से अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाले महान पुण्य राशि प्राप्त होती है। व्रजमंडल ने कृष्ण अष्टमी के दूसरे दिन भाद्रपद कृष्ण नवमी में नन्द महोत्सव, दधिकांदौ भगवान कृष्ण के जन्म लेने की खुशी में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

भगवान कृष्ण के श्रीविग्रह पर हल्दी, तेल, घी, दही, केसर, गुलाब जल, मक्खन, कपूर आदि चढ़ाकर ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिड़काव करते हैं। बजने वाले यंत्रो से मंगल ध्वनि बजाई जाती है, भक्तजन मिठाई बांटते हैं। भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव नि: संदेह पूरे विश्व के लिए आनंद-मंगल का सन्देश देता है।