परिचय

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भारत के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। वे एक प्रकांड विद्वान के साथ-साथ एक कवि भी थे। उन्हें ‘अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन’ के नाम से भी जाना जाता है। वे एक मशहूर भारतीय मुस्लिम विद्वान थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कई भाषाओँ जैसे- अरबी, इंग्लिश, उर्दू, हिंदी, पर्शियन और बंगाली में माहिर थे। उन्होंने धर्म के एक कष्टप्रद स्थिति से छुटकारा पाने के लिए अपना उपनाम ‘आज़ाद’ रख लिया। आजादी के बाद वे उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले से सन 1952 में सांसद नियुक्त किए गए और बाद में भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री बने। राष्ट्र के प्रति उनके अमूल्य योगदान के लिए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को मृत्यु के बाद (मरणोपरान्त) सन 1992 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

शुरूआती जीवन

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का, सऊदी अरब में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘मौलाना खैरुद्दीन’ तथा माता का नाम ‘जुलेखा बेगम’ था। उनके पुरखा बाबर के समय में अफ़ग़ानिस्तान के हेरात शहर से भारत आये थे। उनका जन्म एक शिक्षित मौलाना जाति में हुआ था। उनकी माता अरब देश के ‘शेख मोहम्मद ज़हर वत्री’ की बेटी थीं और पिता अफगान मूल के एक बंगाली मुस्लिम थे। सन 1857 के दौरान हुए सिपाही विद्रोह में उन्हें भारत छोड़कर सऊदी अरब जाना पड़ा। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जब 2 वर्ष के थे, तब सन 1890 में उनका परिवार वापस भारत के कलकत्ता शहर मे आकर बस गया।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की शादी 13 वर्ष की आयु में ‘जुलेखा बेगम’ के साथ हुई। परिवार के रूढ़िवादी पृष्ठभूमि के कारण मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को परम्परागत इस्लामी पढ़ाई का ही पालन करना पड़ा। शुरु में उनके पिता ही उनके शिक्षक थे, पर बाद में उनके क्षेत्र के मशहूर अध्यापक द्वारा उन्हें घर पर ही शिक्षा मिली। अबुल कलाम आज़ाद ने पहले अरबी और फ़ारसी सीखी और उसके बाद गणित, रेखागणित, दर्शनशास्त्र और बीजगणित की पढाई की। उन्होंने अंग्रेजी भाषा, विश्व का इतिहास और राजनीति शास्त्र को खुद ही पढ़ाई कर के सीखा।

करियर

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कई लेख लिखे और पवित्र कुरान का पुनः अर्थ किया। उनकी विद्वता ने उन्हें ‘तक्लीक’ यानी परम्पराओं के अनुसरण का त्याग करना और ‘तज्दीद’ यानी नवीनतम सिद्धांतो को अपनाने का निर्देश दिया। उन्होंने जमालुद्दीन अफगानी और अलीगढ के अखिल इस्लामी सिद्धांतो और ‘सर सैय्यद अहमद खान’ के विचारो में अपनी दिलचस्पी बढ़ाई। अखिल इस्लामी भावना से ओत-प्रोत होकर उन्होंने इराक, मिश्र, सीरिया, तुर्की और अफगानिस्तान का दौरा किया। उन्होंने मिश्र में ‘शेख मुहम्मद अब्दुह’ और ‘सईद पाशा’ और अरब देश के अन्य क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। वे इराक में निर्वासित क्रांतिकारियों से मिले, जो ईरान में संवैधानिक सरकार की स्थापना के लिए लड़ रहे थे। उन्हें कांस्टेंटिनोपल में तुर्क युवाओं के आदर्शों और साहस का प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ। इन सभी मुलाकातों ने उन्हें राष्ट्रवादी क्रांतिकारी में तब्दील कर दिया।

विदेश से भारत लौटने के बाद उन्होंने बंगाल के दो प्रमुख हिन्दू क्रांतिकारियों ‘अरविन्द घोष’ और ‘श्री श्याम शुन्दर चक्रवर्ती’ से मुलाकात की और ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से पहले क्रांतिकारी गतिविधियां बंगाल और बिहार तक ही सीमित थी, 2 वर्ष के भीतर उन्होंने पूरे उत्तर भारत और बम्बई में गुप्त क्रांतिकारी केन्द्रों की स्थापना में सहायता की। उस दौरान बहुत सारे क्रांतिकारी केन्द्रों में ज्यादातर मुस्लिम विरोधी हुआ करते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि ब्रिटिश सरकार, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के विरुद्ध मुस्लिम समाज का इस्तेमाल कर रही है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपने सहयोगियों को समझाने की कोशिश की।

सन 1912 में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने मुसलमानों में देशभक्ति की भावना को बढ़ाने के लिए ‘अल हिलाल’ नामक एक साप्ताहिक ‘उर्दू पत्रिका’ शुरू की। अल हिलाल ने ‘मोर्ले मिंटो’ सुधारों के परिणाम स्वरुप दो समुदायों के बीच हुए मनमुटाव के बाद हिन्दू-मुस्लिम एकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। अल हिलाल गरम दल के विचारों को हवा देने का क्रांतिकारी मुखपत्र बन गया। सरकार ने अल हिलाल को अलगाववादी विचारों को फ़ैलाने के कारण सन 1914 में बंद कर दिया। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने तब ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ पर आधारित भारतीय राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के उसी लक्ष्य के साथ एक और साप्ताहिक पत्रिका ‘अल बलाघ’ शुरू की। सन 1916 में सरकार ने इस पत्रिका पर भी प्रतिबंध लगा दिया और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को कलकत्ता से बाहर कर रांची में नजरबन्द कर दिया, जहां से उन्हें सन 1920 के प्रथम विश्व युद्ध के बाद रिहा कर दिया गया।

रिहाई के बाद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने ‘खिलाफत आंदोलन’ के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को जगाया। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य खलीफा को फिर से स्थापित करना था, क्योंकि ब्रिटिश प्रमुख ने तुर्की पर कब्ज़ा कर लिया था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किये गए असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और सन 1920 में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ में प्रवेश किया। उन्हें सन 1923 में दिल्ली में कांग्रेस के एक विशेष सत्र के लिए अध्यक्ष नियुक्त किया गया। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को महात्मा गांधी के ‘नमक सत्याग्रह’ का हिस्सा होने के कारण नमक कानून के उल्लंघन के लिए सन 1930 में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 18 महीने के लिए मेरठ जेल में रखा गया। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सन 1940 में रामगढ अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और सन 1946 तक उसी पद पर बने रहे। वह विभाजन के कट्टर विरोधी थे और उनका मानना था कि सभी प्रांतो को उनके खुद के सविधान पर एक सार्वजनिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के साथ स्वतंत्र कर देना चाहिए। विभाजन ने उन्हें बहुत आहत किया और उनके संगठित राष्ट्र के सपने को चकना चूर कर दिया। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री के रूप में सन 1947 से 1958 तक देश की सेवा की।

मृत्यु

अचानक दिल का दौरा पड़ने से 22 फरवरी 1958 को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की दिल्ली में मृत्यु हो गई।